Saturday, 23 July 2016

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इंग्लैंड की लोकप्रिय सड़क: सोहो रोड़

भारत से कोई भी लेखक मित्र, गायक दोस्त, आलोचक, पत्रकार, संपादक, फिल्मी अदाकार, निर्देशक, खिलाड़ी, चित्रकार, वाकफकार या कोई सगा संबंधी इंग्लैंड आयेगा तो फोन करके कहेगा, ‘‘भाई साहब आपके लन्दन मंे आया हुआ हूं। आपको मिलना है।’’


पहले-पहल तो यह सुन कर हंसी आ जाया करती थी और अगले को प्यार भरे शब्दों से दरूस्त किया करता था, ‘‘श्री मान आपने ब्रमिंघम का नंबर लगाया है तो आपको पता होना चाहिये, मैं लंदन नहीं, बल्कि इंग्लैंड के दूसरे बड़े शहर ब्रमिंघम में रहता हूं। जो लंदन से पूरा एक सौ पच्चीस मील दूर, अर्थात् बढि़या गाड़ी से ढाई घंटे का सफर।’’
खैर, अब इस बात की आदत पड़ गई है। एक बार पंजाबी गायक पम्मी बाई का फोन आया। इंग्लैंड के मोबाईल का अनजाना नंबर देख कर मैंने पूछा, ‘‘कौन?’’ तो आगे से आवाज़ आई।
‘‘भाई साहब मैं आपका सिरनामिया बोल रहा हूं, पम्मी बाई।’’
‘‘ओ बल्ले-बल्ले, भाई साहब आप मेरे सरनामिये नहीं (ैनतदंउम, समान गोत्र अर्थात् सिद्धू) हो। कब आये? कहाँ हो?’’
‘‘मैं लंदन में हूं।’’
‘‘मैं तो यार ब्रमिंघम में रहता हूं। ब्रमिंघम कब आना है? मैं लेने आऊं?’’
‘‘अच्छा चलो। मेरी दो तीन घंटे में फलाईट है, मुझे वापिस जाना है। फिर कभी सही। मैंने सोचा हाल-चाल (कुशलक्षेम) ही पूछ लिया जाये।’’ पम्मी बाई ने प्रेम प्रकट किया।
इस प्रकार लंदन और ब्रमिंघम के बीच दूरी होने के कारण अकसर लंदन आये यार-दोस्त ब्रमिंघम वालों को मिलने से वंचित रह जाते है और ब्रमिंघम आये लंदन वालों से। इंडिया (भारत) के कई लोगों को तो लंदन के सिवाय इंग्लैंड के किसी दूसरे शहर के बारे में पता ही नहीं है। ब्रमिंघम पहुंचने पर वतन से आये सज्जनों की जो अगली और पहली फरमाईश होती है, वह है सोहो रोड़ देखने की। यह फरमाईश सुन कर हम विलायती लोग मन ही मन मुस्कराते हैं। यदि कोई हमारी इस गहन हसी को पकड़ले तो हम फिर भी असलियत नहीं बताते ताकि वे यह न समझे कि हम न ले जाने के मारे कहते हैं। हाजी को मक्का दिखाने का पुण्य कमाने के लिये हम अगले को साथ बिठाकर गाड़ी र्स्टाट कर लेते हैं। साढ़े तीन मिंट बाद जब सोहो रोड़ पर जाकर कहते हैं, ‘‘लो मित्र, आ गये सोहो रोड़ पर।’’
आगे से घूमने आया व्यक्ति टेबल फैन की भांति दायें-बायें सिर घुमा कर आश्चर्यचकित हुआ, ‘‘हैं।’’ ऐसे कहेगा जैसे गुब्बारे में से हवा ही निकल गई हेती है। उस व्यक्ति को सोहो रोड़ के बारे में की हुई अपनी कल्पना का खून हुआ नज़र आता है।
सोहो रोड़ ब्रमिंघम के हैडसवर्थ इलाके में स्थित है। वास्तव में सोहो रोड़ है क्या? जिसे हमारे पंजाब में रहते पंजाबी अजूबा समझते हैं। सोहो रोड़ के बारे में जानकारी देने से पहले इस इलाके हैंडसवर्थ के बारे में बताना भी आवश्यक है। जिसका सोहो रोड़ धड़कता हुआ दिल है। हैंडसवर्थ किसी समय घना जंगल और पहाड़ी इलाका होता था। इस क्षेत्र की सारी जागीर को ऐंग्लो-सैक्सन मालिक का नाम हौंडिस था। हौंडस का नाम और पुरातन अंग्रेजी के शब्द ॅमवतजीपदह (जिसका शाब्दिक अर्थ है जागीर) के सुमेल से हैंडसवर्थ बना है। 1912 में छपे ।दहसव ैंगवद ब्ीतवदपबसम के मुताबिक (पृष्ठ नं. पाँच, दूसरा कॉलम चौथा पैरा) हैंडसवर्थ को 1186 में भ्नदकमूवतकमए 1222 में भ्नदमेूवतजी कहा जाता था। फिर भ्नदकूवतच से बिगड़ कर हैंडसवर्थ बना है।
1045 तक हौंडिस के एक झोपड़ीनुमा कमरे के सिवाय यहाँ और कुछ भी नहीं था। हौंडिस इस झोपड़ी को शिकार खेलने के पश्चात् माँस पकाने और अराम करने के लिये प्रयुक्त किया करता था। फिर कुछ अरसे के पश्चात् हौंडिस यहां आकर रहने लग पड़ा। लेकिन फिर भी डडली के लार्ड ॅपससपंउ थ्पज्र ।देनस िके अनुसार 1806 तक यह खेतों-खलिहानों के साथ घिरा हुआ महज़ एक जंगल ही रहा। 1650 के करीब कुछ लोग आ कर यहां बसे, लेकिन फिर भी यह पाँच-दस घरों का छोटा सा गाँव ही था। 13वीं से लेकर 18वीं सदी तक हैंडसवर्थ ने कोई वर्णनीय विकास न किया और गुप्त ही रहा।
1760 में हैंडसवर्थ मैथ्यू बोलटन की नज़र में चढ़ गया। उसने इस इलाके में अपने रहने के लिए एक महल का निर्माण करवाया जिसको उसने सोहो हाऊस ;ैवीव भ्वनेमद्ध का नाम दिया और यह सैम्यूल वाट द्वारा डिज़ाईन किया गया था। सोहो हाऊस को 1809 में बोलटन की मृत्यु के पश्चात् महिला कालेज, फिर होटल और उसके बाद पुलिस कर्मचारियों के होस्टल में तबदील (परिवर्तित) कर दिया गया था। अब यह सोहो हाऊस, सोहो रोड़ से कुछ दूर म्यूजि़यम बना खड़ा हुआ इस प्रकार लगता है जैसे सोहो रोड़ से रूठ गया हो। सोहो हाऊस का वर्णन करते हुये एक अंग्रेजी कवि ने लिखा है,
ष्ठमीवसक लवद उंदेपवदए सिंदामक इल.
. ब्तवूकपदह जतममेए
ळतंबम जीम हतममद ेसवचमए ंदक बवनतज जीम
.ेवनजीमतद इतमम्रमण्
.ळमदपने ंदक ूवतजीए ूपजी ठवनसजवद जीमतम तमेपकमए
. ठवनसजवद.व िंतजेए जीम च्ंजतवद ंदक जीम हनपकमण्ष्
सोहो शब्द के शाब्दिक अर्थ हैं शिकार मार कर उसका सेवन करने और ऐश करने वाला स्थान। वैसे सोहो वैस्ट एण्ड (लंदन) का एक इलाका है, जो वैस्टमनिस्टर शहर के अधीन आता है। बीसवीं सदी से यह देह व्यापार, रंगीन रात्रि जीवन और फिल्म इण्डस्ट्री का प्रमुख केंद्र रहा है। आज भी ये इलाका इंग्लैंड की सबसे बड़ी सैकस इंडस्ट्री है। 200 से अधिक वर्षों से कानूनी और गैर कानूनी ढंग से सोहो में देह व्यापार दिन रात चल रहा है। इंग्लैंड के कई बड़े-2 लेखक, कवि और चित्रकार अपनी प्रसिद्धी को पचा नहीं पाये और यहां के शराबखानों में अपना जीवन वार गये। साहित्यकारों, फनकारों और चित्रकारों का प्रमुख अड्डा होने के कारण ब्रतानवी साहित्य और कला यहाँ के जीवन की गाथा से ओत-प्रोत है। 1536 तक सोहो केवल कृषि के लिये प्रयुक्त किया जाने वाला क्षेत्र था, उसके पश्चात् हैनरी आठवें ने सोहो में वहाईट हाल महल के लिये शाही बागीचा बनवाया। अंग्रेजी साहित्यकारों के मुताबिक पहली बार सोहो शब्द का इस्तेमाल सैज़ेमोर की जंग में मैनमाऊथ के सामंत ने सिपाहियों को उत्सहित करने और शाबाशी (प्रोत्साहन) देने के लिये नारे के तौर पर किया था। सोहो शब्द का प्रयोग पुरातन शिकारियों की तरफ से शिकार खेलते समय किया जाता था, जिसका अर्थ होता था, मुझे शिकार दिख गया है और मैं उसे मारने चला हूँ।
सोहो इंग्लैंड के एक शहर साऊथ हैंपट का पुराना नाम भी था। 50 का मतलब साऊथ और भ्व् का अर्थ हैंप्टन अर्थात् घर, निवासस्थान या छोटा गाँव है।
मैथ्यू बोल्टन ने हैंडसवर्थ में दबी हुई कोयले की खानें, लोहे और खनिज पदार्थों की खानों को खोजा और 1764 में यहाँ कारखाने और लोहे की ढालें लगानी शुरू कर दी। जो कि बाद में ैवीव थ्वनदकतल और ैवीव डंदनंिबजवतल (सोहो कारखाना) के नाम से प्रसिद्ध हुई। सोहो शिल्पग्रह का निर्माण 1761 में शुरु कर के 1765 में मुकम्मल कर लिया गया था और इसके ऊपर उस समय 9,000 लागत आई थी। 1769 में यहां 700 कारीगर काम करते थे। इन कारखानों में मैथ्यू बोल्टन ने रोजमर्रा (प्रतिदिन) काम आने वाली वस्तुओं के अतिरिक्त स्टील, तांबे और लोहे के अनेकों औज़ार, सिक्के, स्टीम इंजन और धरती में से पानी निकालने वाले विंडमिल बनाये, गैस के साथ रोशनी पैदा करने का आविष्कार किया। इसी लिए मैथ्यू बोल्टन के ब्रमिंघम की इण्डस्ट्री का जन्मदाता कहा जाता है। इस कार्य में उसका साथ दो स्कॉटिश खोजियों और इंजीनियरों जेमज़ वॉर (10 जनवरी 1736-25 अगस्त 1819) और विलियम मरडौख (27 अगस्त 1754 - 15 नवंबर 1839) ने दिया। मैथ्यू बोल्टन ने अपने कारीगरों के निवास स्थान के लिये मकान बनाने आरंभ किये और जिसके परिणामस्वरूप 1851 में हैंडसवर्थ की जनसंख्या छह हजार हो गई। बोल्टन की मृत्यु के कई साल बाद 1860 में सोहो कारखाना दम तोड़ गया।
1881 की जनगणना के अनुसार हैंडसवर्थ की जनसंख्या 32,000 थी और 1911 तक यह बढ़कर 68,610 तक पहुंच गई। 9 नवंबर 1911 की डूमसडे बुक (जायदाद की सूची - रखने वाली पुस्तक, जिसको टैक्स निर्धारित करने के लिये प्रयोग किया जाता था) के मुताबिक हैंडसवर्थ 7,752 ऐकड़ में फैला हुआ था और यह स्टेफर्डशायर के अधीन पड़ता था। जबकि अब यह वार्कशायर के अधीन है। 1871 में हैंडसवर्थ की जनसंख्या 14,359, 1971 में 131,896 और 2001 में 205719 थी। जिनमें से 69.9 प्रतिशत कम गिनती कौमें थी। हैंडसवर्थ में मंदिर, गिरिजाघर, गुरुद्वारे तथा मस्जिदों की कोई कमी नहीं है। रही बात पबों की? वे तो इंग्लैंड के हर शहर में आपको दो सौ से पाँच सौ यार्ड के फासले पर जरूर ही मिल जाता है। इंग्लैंड में पॅब कलचर का पतन हो रहा होने के कारण हैंडसवर्थ के पॅब भी संकटमयी दौर से गुजरते हुए बंद हो रहे हैं और इनका स्थान कलॅब, बार रैस्टोरैंट या इन बार ले रहे हैं। हैंडसवर्थ में अनेकों वार्षिक उत्सव मनाये जाते हैं और मेले लगते हैं, जिनमें से ब्रमिंघम टैटू दिवस, ब्रमिंघम मेला, पुष्प उत्सव, ब्रमिंघम पालतू कुत्ता मण्डी, ब्रमिंघम अंर्तराष्ट्रीय कारनीवाल, स्काऊटज शैली और ब्रमिंघम का सबसे बड़ा बैसाखी मेला प्रमुख है। इस प्रकार भली-भांति बसता हुआ आज का हैंडसवर्थ।
सोहो रोड़ ने सोहो रोड़ बनने के लिये एक लंबा, रोचक और ऐतिहासिक सफ़र तैय किया है। कोयले की खानों में काम करने वाले हैंडसवर्थ के कारीगर काम से छुट्टी होने के पश्चात् एक झील के किनारे नहाने-धोने के लिये हक्ट्ठे होते और फिर इसी झील के किनारे वे माँस भूनते, अपना भोजन बनाते, मदिरा पान करते और अपनी थकान उतारते। कभी-कभार वे अपने मनोरंजन के लिये दूर क्षेत्र से नृत्याग्नाएं भी मंगवा लेते। इस प्रकार वे अपनी थकान मिटा कर तरो-ताज़ा हो कर अगले दिन की दिहाड़ी (मज़दूरी) लगाने के लिये तैयार हो जाते। इस कार्य को वे ‘बैटरी चार्ज’ करना कहते और आज यह अंग्रेजी जुबान का मुहावरा बन गया है। धीरे-धीरे इन नृतकियों ने इस जगह को अपना अड्डा बना लिया और यहां वे शराब बेचती, मुजरे करती और फिर उन्होंने यहाँ देह-व्यापार करना भी शुरु कर दिया। समय के आगे बढने से यहाँ सहूलतों की व्यवस्था भी होती चली गई। मजदूरों के नहाने के लिये सुलभ गुसलखाने का निर्माण कर दिया गया और धीरे-2 झील को भर कर बंद कर दिया गया।
वेश्याओं ने उसी जगह पर ही रास्ता समतल करके एक राह निकाल कर उसके दोनों तरफ अपनी दुकाने अर्थात् झोंपडि़याँ (झुग्गियां) बना ली। यह वह ही रास्ता था जिसको बाद में मौजूदा सोहो रोड़ नाम दे दिया गया। 1798 के नकशे (जो सेंट्रल लाईब्रेरी ब्रमिंघम में उपलब्ध है।) मुताबिक सोहो हिल को मनी-बैग हिल कहा जाता था और सोहो रोड़ का नाम मनी-बैग हिल रोड़ था। मनी-बैग नामकरण भी यहां की तवायफों से संबंधित है। मज़दूर तनखाह से भरे थैले लाते और नृतकियों पर सारा धन लुटाकर खाली थैले लेकर घरों को चले जाते। 1802 में यह नाम बदल कर पार्क-रोड कर दिया गया। 1819 में इसको शरूसबरी रोड़ कहा जाता था, 1834 में यह सोहो स्ट्रीट के तौर पर जानी जाती थी और 1855 में सोहो रोड़ को वुलवरहैंप्टन रोड़ का नाम दे दिया गया था। 1872 के एक नकशे में सोहो रोड़, फैकटरी रोड़ के नाम से दर्ज है।
दूसरे विश्व-युद्ध के समय बंबारी के खतरों को देखते हुये अपनी नस्लकुशी रोकने के मकसद से अंग्रेजों ने वैस्टइंडियन लोगों को कारखानों में अंग्रेजों की जगह लाकर डाल दिया। युद्ध के पश्चात् इन एफरो-कैरेबियन काले लोगों ने देश के पुर्ननिर्माण (दोबारा निर्माण) में अपना बहुत योगदान डाला। इन लोगों ने अंग्रेजों के गुलाम बन कर पशुओं (जानवरों) की भांति इतनी शिद्धत से काम किया कि उनकी मौजूदा नसल को न तो अपनी संस्कृति, इतिहास, संगीत और न ही अपनी मातृ भाषा के बारे में सही या पूरी जानकारी है। एक प्रकार से अंग्रेज लोगों ने उनकी नसल ही खराब करके रख दी है। पुराने बुजुर्ग काले लोगों से आज भी यदि इस संदर्भ में बात छेड़ कर देखो तो उनका मुंह कड़वेपन से भर जाता है और आँखों से खून के आँसू टपकने लगते है। प्रसिद्ध साहित्य शास्त्री, इतिहासकार पत्रकार और लेखिका विकटोरिया कैंबल अपनी 2814 पृष्ठों की पुस्तक ‘‘बलैक्स इन ब्रिटन’’ (जो उसने 12 वर्षों की मेहनत के साथ दो हजार परिवारों के साथ मुलाकात करके लिखी है) में खुलासा करती है, वैस्ट इंडियन लोगों को अंग्रेजों ने इंग्लैंड बुलाने के लिये झूठे सबजबाग दिखाये और बढि़या जीवन प्रदान करने के झूठे वायदे किये थे। लेकिन इंग्लैंड आने पर उनके साथ नसल और रंग के आधार पर बहुत जुल्म किये गये। काले लोगों को बहुत सी जगहों पर जाने की मनाही थी। उस समय इन लोगों की जुबान से उपयुक्त वर्णित पुस्तक के पृष्ठ 24 से 36 में दर्ज किया गया है। काले लोगों के उन बयानों को पढ़ कर इन्सानियत शर्मसार हुई महसूस होती है और उनके द्वारा झेले दर्द का अहसास होता है। इस नसलवाद से निपटने के लिये कालों (अश्वेतों) को भले ही कई वर्ष तो लग गये लेकिन उन्होंने हथियार इतना बढि़या प्रयुक्त किया कि आने वाले कई वर्षों तक भी वह कारगर रहेगा वह हथियार था कलम का। अश्वेतों (काले लोगों) ने लेखक पैदा किये, जिन्होंने उनकी समस्याओं को आधार बना कर साहित्य सृजन किया। उस साहित्य को अश्वेतों का साहित्य कह कर प्रचारित किया और मान्यता हासिल करवाई। आज भी ब्रतानवी लाईब्रेरियों में ठसंबा ॅतपजमतश्े स्पजमतंजनतम नाम की अल्ग शैल्फ देखी जा सकती है।
1961 में वैस्टइंडियनों की संख्या 17000 थी। सोहो रोड़ का नक्शा काफी हद तक बदल चुका था, और यह उस समय काले लोगों की राजधानी होती थी। यहाँ इन लोगों ने अपनी दुकानें, मकान, जुएखाने, चकले और रेस्टोरैंट बनाये। यहाँ वे अपना वार्षिक उत्सव, जिसे वे कार्नीवल कहते हैं 1984 तक बादस्तूर मनाते रहे। अश्वेतों का एक प्रकार से यहाँ शासन ही चलता था। पॅबों में सरेआम दो नंबर के काम होते। गैरकानूनी हथियार और नशीले पदार्थ खरीदे और बेचे जाते। फिरंगी पुलिस भी कोई ज्यादा इस इलाके में दखलअंदाजी नहीं करती थी। लड़ाई-झगड़ा, मार-पीट होने पर यदि पुलिस को सूचित भी किया जाता तो भारतीय पुलिस की भांति ही ब्रतानवी पुलिस भी वारदात हो जाने के बाद ही पहुंचती।
ब्रमिंघम में आज भी हैंडसवर्थ में जुर्म की दर सब से अधिक है। इसी कारण इस इलाके में गाडि़यों और घरों की इंशोयरंस महंगी होती है, क्योंकि छीना-झपटी, चोरी-चकारी का संदेह अक्सर बना रहता है। यहाँ वर्णनीय है कि गोरे-काले लोग अधिक से अधिक नौ कैरेट का सोना पहनते हैं और भारतीय बाईस या चौबीस। इन लोगों को पता ही नहीं रता था कि चौबीस कैरेट का सोना भी होता है और वह उनके सोने से भी महंगा होता है। यह बात कितनी हद तक सही या गलत है, ये तो मैं दावे के साथ नहीं कह सकता, लेकिन समाचारों और पुलिस छानबीन संबंधी छपे लेखों में यह भी जिक्र आता है कि भारतीय सुनारे कालों का उकसा (उतेजित) कर लूट-पाट और चोरियों करवा कर उनसे सस्ते भाव पे सोना खरीदते और फिर उसे आगे ग्राहकों को बेचते। शादी-ब्याह के अवसर पर जब कोई बड़ी मात्रा में सोना खरीद कर ले जाता तो अपने ग्राहक के घर चोरी करने के लिये कालों को यह जानकारी, ये सुनार (थोडेसे, सारे नहीं) ही देते। इस बात का भेद तब खुला था, जब पुलिस द्वारा इंग्लैंड के किसी और शहर में एक जाल बिछाया गया। पुलिस द्वारा रची साजिश के अधीन एक देसी परिवार को लड़की के ब्याह का बहाना बना कर सोना खरीदने भेजा गया। उस परिवार की तरफ से सुनार को अपने घर का पता वह लिखवाया गया, जो पुलिस द्वारा बताया गया था। मज़े की बात है कि उस पते कर काले लोग (अश्वेत) उसी रात चोरी करने चले गये और पहले से छुप के उनका इंतजार कर रही पुलिस ने वे पकड़ लिये।
लगभग 1960 में ब्रतानवी सरकार ने तीन श्रेणियां ;।ए ठए ब्द्ध के अंर्तगत वाऊचर सिस्टम चलाया था। 1961 के करीब ही भारत और खास करके पंजाब से लोग यहाँ आना शुरु हो गये थे। अफ्रीका से भी भारी मात्रा में पंजाबी लोग यहाँ आये। पंजाबियों ने कोयले की खानें, ढालों, और फैक्ट्रियों में काम किया और कुछ एक को नज़दीक के कसबे लौंगब्रिज में मोटर गाडि़यां बनाने के कारखने में काम मिल गये। पंजाबियों ने भी सोहो रोड़ को धुरी बनाकर इसके समीप के क्षेत्रों में अपने पाँव पसारने आरंभ कर दिये। 1964 में वैस्ट इंडियनों की संख्या रोकने के मकसद से वाऊचर की तीसरी कैटागरी बंद कर दी गई। अंग्रेजों को कारीगर चाहिये थे जो मेहनती कारीगर होने के साथ-साथ अपनी धरती से अधिक जुड़े न हो, अर्थात् पौधे जो जमीन से उखाड़ कर गमलों में लगाये जा सकते हों। जैसे कि फौजी। इस बात का खुलासा करते हुये लेखक और इतिहासकार पीटर रैट कलिफ अपनी भवय-आकार की खोज पुस्तक श्त्ंबपेउ ंदक त्मंबजपवदश् के प्रथम अध्याय के पृष्ठ नं. 17 पर लिखता है, ष्ज्ीम चमवचसम व िच्नदरंइ ींअम कमअमसवचमक ंद नदनेनंस बंचंबपजल वित ंकरनेजउमदज जव बींदहम ूीपबी उंामे जीमउ वदम व िजीम समंेज श्त्ववजमकश् बवउउनदपजपमे पद प्दकपंए उमदजंससलए बनसजनतंपसज ंदक चीलेपबंससलण्ष्
इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुये पंजाबियों के इंग्लैंड आने के कारणों के वर्णन में वह दो प्रमुख कारण बताता है। एक तो गरीबी और धन कमाकर बढि़या जीवन जीने की लालसा। दूसरा वह 1947 के बंटवारे के नतीजों को भ इसका कारण मानता है। उसके अनुसार पाकिस्तान से हिज़रत करके भारत में गये लोग अपनी जड़ें लगाने में असमर्थ रहे लोगों ने विदेशों की ओर आने का रुख किया।
तीन भिन्न-भिन्न नसलें, रंगों और देशों के व्यक्ति एक ही स्थान हैंडसवर्थ में इक्ट्ठे हुये तो वही होने लगा जो इनसानी फितरत है। काले, गोरे और भूरे लोगों में नसली भेद-भाव होने लगे और सोहो रोड़ इनके युद्ध के अखाड़ों की रणभूमि बनने लगा। आये दिन दंगे फसाद होने लगे। एक काली लड़की का एशियनों (पाकिस्तानियों) द्वारा बालात्कार करने पर 1985 में हैंडसवर्थ में एक ऐसा नसली झगड़ा हुआ कि जिसकी लपेट में पूरा देश (मुल्क) आ गया था। उस समय लोगों का काफी जान-माल का नुक्सान उठाना पड़ा था। लेकिन धीरे-धीरे लोग इस सब के आदी होने लग पड़े।
एक-एक करके अश्वेत लोग सोहो रोड़ छोड़ते चले गये और भारतीय अपने पैर जमाते चले गये। फिर यह सोहो रोड़ भारतीयों का मुख्य केन्द्र बन गई। कोई भारतीय सामान, कपड़ा-लत्ता या राशन इत्यादि लेना होता तो वह केवल सोहो रोड़ से ही मिलता था। एक समय तो ऐसा आया कि ऐसा लगने लगा जैसे भारत में आने वाला जहाज़ सीधा उतरता ही सोहो रोड़ पर हो।
प्रदूषण की रोकथाम के लिये सरकार ने कानून बनाये तो फैक्ट्रियां, फाऊंड्रियां बंद होने लगी। कोयले की खानों में से कोयला खत्म हो चुका था। उसके पश्चात् की कपड़े के कारोबार का इनकलाब आया। सोहो रोड़ के आस-पास कपड़े की सिलाई-बुनाई की फैक्ट्रियां खुल गई। ये फैक्ट्रियों वाले बढि़या माल अच्छे स्टोरों को बेच कर बचा-खुचा माल सोहो रोड़ की मार्किट में स्टाल लगा कर बेच लेते। देसी लोग इण्डिया को जाते वक्त सस्ते भाव का यह बाहर का सामान खरीदकर अपने रिश्तेदारों और सगे-संबंधियों को गिफट करके आते। इससे रिश्तेदारी भी न टूटती और जेब भी न रूठती। रब भी राज़ी और मीत (रांझा) भी राजी। इस प्रकार सोहो रोड़ पंजाबियों को किसी न किसी भांति अपने पास बुला लेती। अब तो यह हालत हो गई है कि भले ही पंजाबियों की जरूरत की कोई चीज़ इण्डिया से ना मिले, पर वो सोहो रोड़ से जरुर मिल जायेगी। अधिकतर उपहार देने के लिये प्रयुक्त की जाने वाली वस्तुएं चाईना यां इण्डिया से आती हैं और विलायती लोग खरीद कर इण्डिया तोहफा देने के लिये वापिस लौटाकर ले जाते हैं।
स्त्रियों को बेफिजूल खरीददारी की आदत होती है। इसलिये छुट्टी वाले दिन लड़कियां सज-सवर कर सोहो रोड़ पर आ जाती है और लड़के आवारगर्दी करने वहां आ जाते। आज भी सोहो रोड़ पर खरीददारी करने वाले कम और पहलवानी चक्कर काटने वाले अधिक होते हैं। सोहो रोड़ के किनारे पर लगे बैंचों पर पंजाबी बुजुर्ग-बूढ़े, चौपाल की यादें ताज़ा करने आ बैठते हैं और एक दूसरे के साथ अपना दुख-सुख बाँट कर शाम को अपने-अपने घरों को चले जाते हैं। कुछ बैंचों पर आपको इण्डिया से आये नये नवेले लड़के भी नज़र आ जायेंगे, जो इन बैंचों के ऊपर अपना हक जमाने के लिए शराब पीते यां राह जाती लड़कियों को छेड़ना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं। ये भद्र पुरुष लड़कियों को फिक्रा कसते हुये यह भी नहीं देखते कि उस लड़की के साथ उसका भाई, पिता, पती या मर्द मित्र जा रहा है। बस ये तो किसी और के बीच में से निकाल कर ‘सत श्री अकाल’ कहने से भी नहीं चूकते। इस प्रकार सोहो रोड़ ने सैरगाह वाला रुतबा हासिल कर लिया है। कहने का भाव सोहो रोड़ वही है जो पटियाला का 22 नंबर फाटक, चंडीगढ़ की सुखना झील, मुंबई का बैंड स्टैंड, दिल्ली का पालका बाजार है या काठमांडू का पशु-पति।
अब प्रश्न यह उठता है कि सोहो रोड़ की धूम पंजाब तक कैसे पहुंची? यह सब मीडिया तथा लेखकों की मेहरबानी है। बीती सदी नौवें दहाके (दशक) में इंग्लैंड के एक पंजाबी संगीत ग्रुप ‘आपना संगीत’ ने गीत निकाला था, ‘‘सोहो रोड़ ते तैनू लभदा, फिरां नी मैं कन्नां विच मुंदरा पा के, इंडिया च मेरे नाल अकखां जो लड़ाईयां भुल गई वलैत विच आ के।’’ वह गाना इतना चला कि सोहो रोड़ की मशहूरी को इंग्लैंड तक सीमित न रख कर विश्व स्तर तक ले गया। बात क्या थी फिर तो पंजाब के कई गीतकार जिनके पासपोर्ट भी नहीं बने थे, सोहो रोड़ तो उन्होंने क्या देखनी थी? उन्होंने भी अपने गीतों और बोलियों में सोहो रोड़ को फिट करना शुरू कर दिया। इस प्रकार सोहो रोड़ की छवि में बढ़ोतरी होती गई।
कुछ वर्ष पहले हम स्टूडियो में बैठे गाना रिकार्ड कर रहे थे। इण्डिया से आये एक गायक का गाना था जिसमें जी.टी. रोड़ पर दौड़े जाते तेज़ रफतार ट्रक का वर्णन था, रिकार्ड हो रहा था। मैंने तो अभी उस भले मानस गायक का तल्लफज़ और काफिया ही ठीक करवा रहा था कि उसने सोहो रोड़ पर ट्रक दौड़ाना शुरू कर दिया। मैंने उस से पूछा, ‘‘अरे, ये क्या कर रहे हो?’’ तो सामने से उस ने छाती फूला कर जवाब दिया, ‘‘भाई साहब देखियेगा, चलेगा बहुत ये गीत, मैंने इसमें सोहो रोड़ को डाल दिया है।’’
मुझे उसकी मूर्खता पर हँसी भी आई और खीझ भी। फिर उस गायक को रिकार्डिंग रूम से बाहर निकाल कर समझाया कि जो वह कर रहा है, ठीक नहीं है और न ही वह गाने के साथ इंसाफ है, क्योंकि गीतकार ने जिस विष्य को छुआ था उसको सारे गीत में खूबसूरती से निभाया था, दूसरा सोहो रोड़ प्रयोग करने से वह गीत यथार्थ से कोसों दूर जाता था। सोहो रोड़ का एक किनारा जा कर हौलीहैड़ रोड़ को लगता है जो कि सीधी जाकर मोटर वे को मिलाती है, जहाँ से इंग्लैंड के किसी भी हिस्से की तरफ जाया जा सकता है और दूसरे किनारे ने सोहो हिल का पल्लू पकड़ा हुए है, जो कि ब्रमिंघम सिटी सैंटर की तरफ जाता है। इसलिये सोहो रोड़ पर इतना टैªफिक होता है कि 0.8 मील (मील से भी कम) के इस फासले और पैलिकन क्रासिंग बत्तियाँ, पाँच टैªफिक बत्तियों को पार करने के लिये कार में आधा घण्टा लगना मामूली सी बात है और हमारे गायक साहब वहां से सौ मील प्रति घंटे की रफतार से ट्रक दौड़ा रहे थे। इंग्लैंड में सत्तर मील से अधिक मोटरवे पर गाड़ी (ट्रकों के लिये रफतार उससे भी कम है।) चलाना भी अपराध है और हमारा पंजाबी गायक तीस मील रफतार वाले क्षेत्र में इस वृतांत का वर्णन कर रहा है।
वैसे अंग्रेजी साहित्य में हज़ारों की तादाद में साहित्य की भिन्न-भिन्न विधाओं में रचित रचनाएँ उपलब्ध हैं, जिनमें सोहो रोड़ का वर्णन आता है लेकिन हैंडसवर्थ में पला-बड़ा कवि बैंजमिन ;ठमद्रंउपर्द मचींदपंीद्ध की सोहो रोड़ पर लिखी एक कविता सोहो ैवीव त्वंक जीमद ंदक दवू बहुत मशहूर हुई है। जिसकी कुछ पंक्तियाँ उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत हैं:-
ष्भ्ंदकेूवतजी ूंामे
ठनज भ्ंदकेूवतजी दमअमत ेसममचे
।दक ेव ीव तवंक पे ूीमतम जीम ीमंतज इमंजेए
प्दकनेजतपवने पज ींे ंसूंले इममद
।दक जीम चमवचसम ींअम ंसूंले इममद ाममद
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सोहो रोड़ के एक छोर पर गुरुद्वारा याद शहीद बाबा दीप सिंह सुशोभित है, (अब यह गुरुद्वारा सोहो रोड़ की हद में न होकर सोहो रोड़ को जुड़ती हौलीहैड़ रोड़ पर है) और दूसरे छोर पर गुरुद्वारा गुरु नानक निष्काम सेवक जत्था है। दो गुरुद्वारों के बीच घिरी सोहो रोड़ को हैलीकॉप्टर से देखने पर ऐसी लगती है जैसे स्पीचमारकों के बीच कोई भावपूर्ण खूबसूरत वाक्य लिखा हो।
1930 मंे सोहो रोड स्थित 2000 सीटों वाला रीगल सिनेमा इंग्लैंड का सबसे मशहूर सिनेमा गिना जाता था, जिसका अब नामो-निशान तक नहीं है। आज सोहो रोड़ पर सबसे अधिक भारतीय साडि़यां, सूटों और दूल्हा-दुल्हन के लिबासों की दुकाने हैं, जिनकी कुल संख्या 42 है, 20 दुकानें यहां फासट-फूड की हैं, जिनसे आपको कैरेबियन, चाईनिज़, इटालियन, फ्रांसीसी, अमेरिकन, कांटीनेंटल, तुर्की और भारतीय-पाकिस्तानी खानों (भोजन) के अतिरिक्त इंग्लैंड का राष्ट्रीय भोजन अर्थात् मछली-चिप्स असानी से मिल जाते हैं। 15 मिठाईयों की दुकानें हैं जिनके बीच में ही रैस्टोरेंट बने हैं और यहां से आप बारह महीने तीन दिन हर प्रकार के परांठे, लस्सी (छाछ), साग और गर्म-2 ताज़ी जलेबियां अपनी आँखों के सामने बनवा कर खा सकते हो। भारतीय गहने (आभूषण) खरीदने का मन हो तो अपकी जेबें ढीली करने के लिये सोहो रोड़ पर 17 सुनारों की दुकाने हैं। सोहो रोड़ के मध्य में 20-25 दुकानों के सामर्थय वाली दो मंजिलों का एक शापिंग माल है। सोहो रोड़ पर 11 छोटे बड़े अंग्रेजी, यूरोपीयन, तुर्की पाकिस्तानी और भारतीय सुपरस्टोर हैं और आठ न्यूज़ एजेंट-ऑफ लाईसेंस (ठेके) हैं। 10 नाखून श्रंृगार घर और ब्यूटीपार्लर हैं। 10 ट्रैवल ऐजंट और इंशोंरंस ब्रोकर, 9 बिजली उपकरणों के शोरूम है। बस स्टाप, 9 दवाखाने, 8 बाल काटने वाले बार्बर, 8 वकीलों के दफतर हैं, जो क्रिमिनल, सिविल और इमीग्रेशन के मसलों के माहिर हैं। यहां 6 बैंक हैं, ठंतबसंलश्ेए स्पसवलके ज्ैठए ैजंजम ठंदा व िप्दकपंए ठंदा व िठंतवकंए च्नदरंइ छंजपवदंस ठंदाए ठंदा व िप्दकपं और तीन बिल्डिंग सोसायटी है, छमज ॅमेजए ॅमेज ठतवउूपबीए छंजपवद ूपकम इन बिल्डिंग सोसायिटयों का काम भी लगभग बैंकों वाला ही होता है। यहां छह पॅब हैं। ‘गेट टू इंडिया’, पॅब के पास से सोहो रोड़ के नीचे से रेलवे लाईन गुज़रती है। 1837 में लिवरपूल के साथ ब्रमिंघम को जोड़ने के लिये इस गै्रंड रेलवे जंकशन का निर्माण किया गया था।
सोहो रोड़ पर सिक्कों और क्रैडिट कार्ड के साथ चलने वाले पाँच फोन बूथ हैं, जिनके बीच में ही इंटरनैट की सहूलियत भी है। यदि आप के पास खुले पैसे या कार्ड ना भी हों तो फिर भी आप फोन के कीपैड से अंग्रेजी शब्द त्मअमतेम ज्लचम करके मुफत में फोन कर सकते हो यदि कॉल लेने वाला अप्रेटर के सूचित करने पर उस काल का खर्च वहन करना मंजूर करे। इसके अतिरिक्त पाँच बेकरियां, पाँच भारतीय संगीत और फिल्में बेचने वाली दुकानें, पाँच फोटोग्राफर और पेंटिगज़ बेचने वाले हैं। सोहो रोड़ पर चार जूतों की दुकानें, चार माँस ;डमंजद्ध की दुकानें, जिनसे देसी मुर्गा, तीतर, बटेर, गाय, सूअर आदि लगभग हर जानवर और पक्षी का मीट मिल जाता है। चार कार पार्कों, चार ऐनकसाज़, तीन फर्नीचर शोरूम और यहाँ तीन कम्यूनिटी सैंटर हैं। एक सैंटर के मुख्य रूप से संचालक जमीकण हैं, दूसरा सिक्ख यूथ एण्ड कम्यूनटी सैंटर और तीसरा शहीद ऊधम सिंह वेलफेयर सैंटर है जिसे तर्कशील सोसायटी के दफतर के तौर पर भी प्रयुक्त किया जाता है। इन सैंटरों से कानूनी सलाह-मश्वरे, शिक्षा, ट्रेनिंग और फार्म आदि भरवाने का काम मुफत लिया जा सकता है। यहाँ तीन ड्राईक्लीनर, दो जुआघर, दो मनीट्रांसफर केंद्र, दो किताबों (एक सिक्ख साहित्य की और दूसरे इस्लामी साहित्य की) की दुकानें, दो इंटरनेट कैफे (जो समालियन चलाते हैं), दो नोटरी पब्लिक, धार्मिक प्रवृति वालों के लिये दो गुरुद्वारे और दो चर्चों के अतिरिक्त एक डाकखाना, दो लैटरबॉकस, एक स्नोकर क्लॅब, एक चैरेटी शॉप, एक दांतसाज़, एक कलीनिक, एक रोजगार एजेंसी, एक रोजगार दफतर, एक कोच स्टेशन, एक फूलों की दुकान, एक कालेज, एक लाईब्रेरी है, जो 1940 में खोले जाने से पूर्व काऊंसिल हाऊस के लिये 30 अक्तूबर 1877 में विक्टोरियन ईंटों से बनाई गई थी। सोहो रोड़ से परे लेकिन बिल्कुल मुख्य पुलिस स्टेशन और पेट्रोल स्टेशन भी है। सोहो रोड़ के आसपास जिस्मफरोशी आज भी चलती है, लेकिन ढंग और तरीके बदल गये हैं।
यदि हैंडसवर्थ को लुधियाना और सोहो रोड़ को चौड़ा-बाज़ार कह लें तो कोई अतिकथनी ना होगी। जैसे लुधियाना कलाकारों का गढ़ है, वैसे ही हैंडसवर्थ ने भी बहुत से कलाकार पैदा किये है जिनका अंग्रेजी संगीत में एक ऊँचा स्थान रहा है। स्टील पलस, जिसने अपनी पहली संगीत एलबम का नाम भी अपने क्षेत्र के नाम पर श्भ्ंदकेूवतजी त्मअवसनजपवदश् रखा था। वैबस्टर बूथ, जोऐन अर्मी-टेªनिंग, पैरो बैनटन, स्टीव विनवुड, गिटारवादक रिचर्ड माईकल और रॉक ड्रमर कार्ल पालकर के अतिरिक्त अनेकों महान हस्तियों का जन्म हैंडसर्थ में हुआ है।
पंजाबी गायक बलविंदर सफरी के गीत ‘‘पार लंघा दे वे घडि़या मिन्नतां तेरीआं करदी’’ का संगीतकार बूटा जगपाल, उसका भाई बाली जगपाल और जस्सी सिद्धू भी हैंडसवर्थ में पैदा हुये हैं और इन्होंने अपने ग्रुप का नाम  ठ21 रखा था, जो कि हैंडसवर्थ का पोस्ट कोड है। बलविंदर सफरी, ए.एस. कंग, सुखजिंदर शिंदा, त्रिलोचन बल्गा, देवराज जस्सल, गुरुचरन मल्ल (48 घंटे लगातार ढोल बजा कर गिनीज़बुक में नाम दर्ज करवाने वाला ढोली) अपाची इंडियन और अनेकों कलाकार हैंडसवर्थ के बाशिंदे हैं। ऐशियाई भाईचारे के साथ संबंधित कोई भी व्यापार करने के लिये सोहो रोड़ को ही उपयुक्त स्थान माना जाता है। इसी वजह से देसी मीडिया वाले अन्य किसी जगह पर अपना दफ़तर बनाने से पहले सोहो रोड़ से ही शुरुआत करते हैं। अनेकों अखबारों, रेडियो स्टेशनों और ऐशिया टी.वी. चैनलों का आगाज़ सोहो रोड़ से ही हुआ है, भले ही सोहो रोड़ पर अब किसी भी प्रकार का मीडिया नहीं है। भारतीय लोग भी सोहो रोड़ को छोड़ते आ रहे हैं और उनकी जगह पौलिश और रशियन लोग अपनी दुकानें बना रहे हैं ये लोग भारतीय लोगों से अधिक मेहनती और भले हैं। इन पौलिश लोगों की स्त्रियां खूबसूरत, प्यार करने वाली और सबसे बड़ी बात वफादार इतनी हैं कि प्रेमी के लिये जान देने लगी भी सोचेंगी नहीं। यह अनुमान लगाया जा सकता है कि सोहो रोड़ के अगले शासक पौलिश ही होंगे।
बीते दिनों पहले किसी काम से हाईकोर्ट, चंडीगढ़ के वकील और पंजाबी लेखक बी.एस. ढिल्लों जो को फोन किये और उनके उठाने पर मैंने अपना परिचय दिया, ‘‘ढिल्लों साहब मैं इंग्लैंड से बलराज सिद्धू बोल रहा हूं।’’
ढिल्लों साहब ने पहचान कर गिला करते हुये कहा, ‘‘आप इंग्लैंड में ही रहते हो न? मैं इंग्लैंड आया था। आपके साथ मुलाकात नहीं हो सकी।’’
दरअसल जब ढिल्लों साहब इंग्लैंड आये थे तो मैं उस समय बैल्जि़यम गया हुआ था। अपने आप को कवर (सुरक्षित) करने के लिये मैंने कह दिया कि मैं ब्रमिंघम रहता हूं तो वे सामने से कहने लगे, ‘‘मैं ब्रमिंघम भी आया था। आपकी वह सोहो रोड़ तो कुछ भी नहीं। पंजाब की भांति लोग दुकानों के आगे रेहडियां सी लगा कर बैठे हैं। तुम्हारे लोग भी हद्द हैं भाई ऊधम सिंह सैंटर में गोरे एम.पी. को बुलाकर डायर को मारने के समय की ऊधम सिंह की तस्वीर भेंट किये जा रहे थे। डायर तो उन गोरों का बाप था।’’
मैंने ढिल्लों साहब को टोकते हुये कहा, ‘‘ढिल्लों साहब यही तो है सोहो रोड़।’’ ढिल्लों साहब ठहाका लगा कर हंसे। कुछ भी कह लें सोहो रोड़ तो सोहो रोड़ ही है। जैसे लाहौर वाले कहते हैं कि जिसने लाहौर नहीं देखा वह पैदा ही नहीं हुआ। इस प्रकार यह भी कहा जा सकता है कि जिसने सोहो रोड़ नहीं देखी वह इंग्लैंड घूमा ही नहीं।

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