Saturday, 23 July 2016

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साहित्य, संगीत तथा कला में अशलीलता

कठोर से कठोर हृदय वाले व्यक्ति के खून में भी कुछ ऐसे तत्व होते हैं जो उसे रहम दिल, दयावान और भावुक बनाने का सामर्थय रखते हैं। जब ये तत्व या ब्लड-सैल अपना असर दिखाते हैं तो मनुष्य का व्यक्तित्व एकदम बदल जाता है। दुनिया के इतिहास में इस की अनेकों मिसालें मिली हैं, जैसे लक्ष्मण दास से बना बंदा बहादुर, सम्राट अशोक का कालिंगा के युद्ध के बाद हृदय परिवर्तन होना, बादशाह अकबर का जबरदस्ती से स्त्रियों को अपने हरम में रखना और दूसरी तरफ जनहित के कार्य करना आदि बहुत सही उदाहरणें है।


यही तत्व मनुष्य के भीतर प्रेम का भाव पैदा करते हैं। प्रेम मनुष्य का झुकाव सूक्ष्म कलाओं की तरफ झुकाता है। इसी कारण से दुनियां के प्रत्येक व्यक्ति का किसी न किसी कला के साथ लगाव होता है। चाहे यह साहित्य, संगीत, नृत्य, चित्रकला, बुत्त-तराशी, अदाकारी या कोइ अन्य हो। इन कलाओं को प्यार करने वाला व्यक्ति जब उस कला को किसी कलाकार की किसी बढि़या रचना के सम्मुख होता है तो स्वाभाविक ही उसके मन में उस कलाकार के लिये सम्मान और श्रद्धा उत्पन्न हो जाती है। जैसे कि अदाकारी को प्यार करने वाले जब किसी अभिनेता या अभिनेत्री की बढि़या एकटिंग देखते हैं तो उसके दीवाने हो जाते है। जब कलाकार को प्रशंसको की मुहब्बत मिलती है, तो वह मकबूल (मशहूर) होने लगता है जैसे-जैसे कद्रदानों की गिनती बढ़ती जाती है, वैसे-2 कलाकार प्रसिद्धी प्राप्त करता जाता है और जिसके साथ समाज में उसका रूतबा ऊँचा होता जाता है। रूतबे की बुलंदी के हिसाब से कलाकार को आर्थिक लाभ और दिमागी सकून मिलने लगता है। यही कारण है कि हर कलाकार अपनी कला के साथ न शाहकार का सृजन करने का यत्न करके हमेशा अपने आप को सर्वोत्तम सिद्ध करने की कोशिश में लगा रहता है। कलाकृति को बढि़या बनाने के प्रयास में कई बार कलाकार से कोई गलती भी हो जाती है। इसके साथ उसकी रचना दोषपूर्ण हो जाती है। जिसकी लोगों द्वारा आलोचना भी की जाती है। आलोचना का निशाना बनी कृति कई बार कलाकार को नुक्सान पहुँचाने की बजाय फायदा भी देती है, जो अन्य कलाकारों को वही गलती जानबूझ कर करने के लिये उकसाती है। साहित्य, संगीत, नृत्य, चित्रकारी और बुत्ततरॉशी में जानबूझ कर भरे जाते ऐसे ही एक दोष का नाम है अशलीलता जिसे उर्दू में फाहसीपन और अंग्रेजी में टंनसहंतपजल कहते हैं।
अशलीलता का अर्थ लज्जा पैदा करने वाला कार्य होता है, जिसे सभ्य समाज कबूल न करता हो। अशलीलता और शलीलता के भीतर बहुत ही महीन अंतर होता है। मिसाल के तौर पर किसी लड़की के साथ बलात्कार करना अशलीलता है और प्यार तथा सहमति के साथ शारीरिक संबंध बनाना शलीलता है। माँ के पति को पिता कहना शलीलता है। और माँ का खसम कहना अशलीलता। कुछ नामी विद्वानों के अनुसार यदि हम संभोग शब्द लिख देते है तो वह अशलील है, लेकिन यदि इसकी जगह अंग्रेजी शब्द सैक्स लिखते हैं तो यह शलील है  जाट भाषा में कह लें तो पांव की तरफ लेटे या सिरहाने की तरफ कमर तो बीच में ही आयेगी। लेकिन इसे देखने का दृष्टिगोचर अलग-अलग होता है।
अशलीलता का सीधा संबंध सैक्स के साथ जुड़ा हुआ है। वह काम उत्तेजित  हरकत जो हमारी पांचों ज्ञानइन्द्रियों के माध्यम द्वारा एक मनुष्य से दूसरे तक पहुंचे, उसे अशलील कहा जाता है। यहां नोट करने वाली बात है कि कोई भी काम उत्तेजित करने वाली हरकत उतनी देर तक अशलील नही बनती जितनी देर तक उसका संचार एक व्यक्ति विशेष से दूसरे तक नहीं होता। मिसाल के तौर पर कोई स्त्री आपके पास वाले कमरे में अपने कपड़े उतारे तो वह शलील है। लेकिन यदि वह आपके कमरे में आकर अपने जिस्म की नमाईश करे, तो वह अशलील हरकत बन जाती है। काम उत्तेजित हरकत तीन रूपों द्वारा सफ़र करके अशलीलता की पदवी प्राप्त करती है, वे तीन रूप हैः स्वर, स्पर्श, साक्षात।
1ण् स्वर: बोले या सुने गये अभद्र शब्द, जैसे कि कोई गंदी गली, बात या गीत आदि।
2. स्पर्शः किसी दूसरे व्यक्ति को ऐतराज योग्य स्थान से छूना आदि।
3. साक्षातः कोई नग्न वस्तु, इंसान या दृश्य देखना आदि।
जिन कलाकारों की कला में ैमग जवनबी (कामुक छुअन) विद्यमान होती है। उसके दो कारण होते हैं। एक तो वह खूद कामुक तौर पर अतृप्त अथवा अधिक कमी होते हैं और दूसरा तीव्र प्रसिद्धि प्राप्ति की इच्छा। मैं यह दावे के साथ कहता हूं कि जिन पर अशलीलता का दोष लगता है उन पर केवल एक नहीं, इक्टठी ये दोनों बातें लागू होती हैं। यदि कोई मेारी इस बात को अस्वीकार करता है तो वह 100ः कोरा झूठ बोलता है। यह अल्ग बात है कि कोई कबूल न करना चाहे, पर हकीकत यही है। अशलीलता-अपनी कला को मकबूल (मशहूर) करने के लिए कलाकार के पास ैीवतजबनज और ैनचमत ंिेज अर्थात् तीव्र और आसान रास्त है। इस विचार की पृष्टि के लिये मैं कुछ प्रमुख कलाओं और कलाकारों के निम्नलिखित उदाहरण दे रहा हूं। (यहां मैं केवल उनकी उदाहरण दे रहा हूं जिनका पंजाब और पंजाबियत के साथ संबंध है:
अमृता शेरगिल्ल: (चित्रकारा)
अमृता एक बहुत प्रसिद्ध चित्रकार रही है। वह महाराजा रणजीत सिंह की पोती प्रिंसेस बंबा के प्रेमी उमराऊ सिंह मजीठिया की सुपुत्री थी। अमृता यूरोपिन मार्डन आर्ट पेंटिंगें कई साल बनाती रही। किसी ने उसे पूछा तक नहीं। वह कभी बुझे मन से चित्रकारी हथे देती तो कभी फिर लग जाती, जब उसके भीतर की कला पुनः उसे पुकारती। अमृता ने ऊब का सैलफ न्यूड पोरटरेट अर्थात् अपना ही नग्न चित्र बना डाला। बस फिर क्या था, तहलका मच गया। उसके बाद वह गर्मागर्म चित्र बनाती रही। शोहरत और दौलत अमृता के कदमों को चूमती रही। अब तक की वह सबसे महंगी भारतीय महिला पंेटर है। भारत सरकार ने उसके 150 चित्रों को राष्ट्रीय कला संपत्ति घोषित करके नैशनल गैलरी ऑफ मार्डन आर्ट, नई दिल्ली मंे संभाल रखा है।
सोभा सिंह: (चित्रकार): जगत प्रसिद्ध सोभा सिंह किसी जान-पहचान के मोहताज नहीं हैं। फौजी अफसर देवा सिंह के घर गुरदासपुर में जन्में सोभा सिंह ने काफी समय तक फौज में नौकरी करने के पश्चात् (पूर्णतः) चित्रकार बनने का फैसला किया। उसने साधारण चित्रों के साथ-साथ गुरु साहिबानों के चित्र बनाये, लेकिन कोई विशेष प्राप्ति न कर सका। वह खुद अपने पैसे खर्च करके चित्र बनाता और बेचने की कोशिश करता। लेकिन उसे कोई खास कमाई न हुई। उसकी आर्थिक हालत दिन-प्रतिदिन मंदी (बुरी) होती चली गई। फिर सोभा सिंह से श्रद्धा में एक चित्र बनाया गया, जिसमें उसने गुरु साहिब के दरबार में नूर जहाँ खड़ी दिखा दी। इस पर मुस्लमारों ने विवाद खड़ा कर दिया, जिससे सोभा सिंह टूट गया। एक दिन रेलवे  स्टेशन पर सोभा सिंह ने एक कुली को देखा, जिसके बड़े से डौले (बाजू) पर ताबीज और सिर पर पट्टी की भांति परना (गमछा) बांधा हुआ था। उससे कुछ समय बाद एक दिन सोभा सिंह ने अपनी धर्म पुत्री को सफेद सूती साडी पहने घड़ा उठाकर एक जगह से दूसरी जगह रखते हुए देखा। सोभा सिंह की कल्पना दौड़ पड़ी। उसने इन दोनों माडलों को जेहन (दिमाग) में चित्रित करके सोहनी-महीवाल की तस्वीर बनाई। जिस में सोहनी का वक्षस्थल (छाती) और जांघे गीले कपड़े के चिपक जाने के कारण दिखाई देते हैं। वर्णनयोग्य है कि पश्चिमी आलोचक इस तस्वीर को अश्लील घोषित करते हैं। वह तस्वीर इतनी ज्यादा मशहूर हुई कि हर पंजाबी ने देखी हुई है। उसके बाद सोभा सिंह के बारे -न्यारे हो गये और वह अब तक का सबसे बड़ा सिक्ख चित्रकार है। याद रहे सोभा सिंह सोहणी महीवाल वाली उस तस्वीर के कारण प्रसिद्ध है ना कि सिक्ख गुरु साहिबानों की तस्वीरें बनाने के कारण।
अमर सिंह चमकीला (गायक और गीतकार)ः
अमर सिंह चमकीला दुगरी, लुधियाना के एक गरीब परिवार में धनी राम के नाम के साथ पैदा हुआ। घर की खस्ता हाल गरीबी के कारण वह केवल पंाचवी-सातवंी कक्षा तक ही पढ़ सका। रोजी रोटी के लिए मजदूरी करते हुए चमकीले को गीत लिखने का शौंक पड़ गया। गीत लिखते हुए वह कभी-कभी गा भी लेता। इस प्रकार वह अन्य गायकों के साथ सहायक के तौर पर भी चला जाता। फिर उसके अपने गानों का रिकार्ड आया,‘टकुए ते टकुआ खड़के’ इस रिकार्ड के (एल पी) सारे के सारे गीत पंजाब में आग की भांति फैल गये और चमकीले के गाने का सिलसिला शुरू हो गया। चमकीला इतनी तेजी से मशहूर हुआ कि उसने पंजाब के सभी गायकों को खाली करके एक तरफ कोने में लगा दिया। चमकीला पंजाबी का एक मात्र गायक हुआ है, जो गानों को एक टेक में रिकार्ड करवा देता था। पंजाबी जुबान को अपने गीतों द्वारा 95 नये मुहावरे देना चमकीले की सबसे बड़ी देन है। आतंकवाद के दौर में चमकीले को उसकी प्रसिद्धी के कारण कत्ल करवाया गया। लेकिन वह आज तक उसी तरह बिक रहा और सुना जा रहा है। चमकीला पंजाबी का अब तक का सबसे अधिक बिकने वाला गायक और गीतकार है। 
हनी सिंह (रैपर और संगीतकार)
यो-यो हनी सिंह में हरदेश सिंह के नाम से जाना जाता था। इंग्लैंड से संगीत की शिक्षा लेकर वह भारत आ गया। इंग्लैंड में रहते हुये हनी पर काले लोगों का प्रभाव पड़ गया, जो उसके द्वारा किये गये कार्योें में से साफ दिखाई पड़ता है। उस ने पच्चीआं पिण्डां (असली टायल सब जानते है) एक निहायत ही अश्लील गाना गा कर यू-टियूब पर डाल दिया। यह गाना कुछ ही दिनों में इतना मशहूार हो गया कि हनी को धड़ाधड़ काम मिलने लगा पंजाबी के तकरीबन सभी गायक हनी से म्यूजि़क करवाने के लिए मछली की भांति तड़पने लगे। हर गीत के बाद हनी अपनी कीमत बढ़ाता चला गया। फिर उसे बॉलीवुड से प्रस्ताव (ऑफर) आने लगें। पंचीआं पिण्डा वाला अब तक का पंजाबी का सबसे अश्लील गीत है। उसका गाना ‘लक टवैंटी ऐट कुड़ी दा’ बी.बी.सी. चार्ट में काफी समय तक नंबर एक के स्थान पर रहा। हनी सिंह पंजाबी और बॉलीवुड का अब तक का सबसे महंगा संगीतकार है जिसने एक गाने की कीमत ‘‘सत्तर लाख रूपये वसूल की है’’।
नरगिस-अभिनेत्री और नृत्यांगना:
पंजाब के गुजरावालां में पैदा हुई गज़ाला नाम की पाकिस्तानी अभिनेत्री नरगिस के नाम से जानी जाती है। फिल्मों में उसे विशेष प्राप्ति न हो सकी, लेकिन अपने हुस्न के बल पर वह अंडरवर्ल्ड डॉन आबिद बॉक्सर की प्रेमिका बन गई और उसके साथ कैनेडा चली गई। आबिद ने उसके बाल काटकर उसे बेआबरू करते हुये कनॉडा से निकाल दिया। उसकी हुई बदनामी के कारण पाकिस्तान फिल्म इंडस्ट्री में पुनः उसे कोई खास काम नहीं मिला। वह स्टेज शोज़ में डांसर बन के जाने लगी। यहीं से उसने और उसकी बहन दीदार ने गर्म गीतों पर काम-भड़काऊ (उत्तेजित) नृत्य करने शरू किये और प्रसिद्धी प्राप्त की। नरगिस की इतनी माँग होने लगी कि वह एक घंटे के मुजरे के बीस लाख रूपये लेने लग गई, जो उस समय किसी पंजाबी लड़की की तरफ से अपने नृत्य का सबसे अधिक मेहनताना था। बहुत सारी धन-संपत्ति बनाने के बाद जुबेर शाह के साथ निकाह करवा के अब वह जौहर टाऊन लाहौर में रहती है और अब उसने नृत्य (डांस) करना बंद कर दिया है।
माही गिल (अभिनेत्री)
जिसका वास्तविक नाम रिम्पी कौर गिल है। चंडीगढ़ में पैदा हुई अभिनेत्री है। अभिनेत्री बनने के लिए हाथ-पैर मारते हुये उसे पम्मी बाई की वीडियो और हवाएँ फिल्म में छोटा सा रोल मिल गया। उसके बाद उसने एक दो पंजाबी फिल्में भी की। लेकिन अपनी पहचान स्थापित नहीं कर सकी। उसके पश्चात् उसने देव डी में बोल्ड सीन किया और उसे सर्वोत्तम अभिनेत्री का फिल्म-फेयर अवार्ड मिल गया। इसने उसकी झिझक खत्म कर दी और फिर ऊपर नीचे तोमर-पान सिंह में इरफान खान के साथ, सहिब बीवी और गैंगस्टर में जिम्मी शेरगिल के साथ तथा रणदीप हुड्डा के साथ और राम गोपाल वर्मा की नाट ए लव स्टोरी में कामुक दृश्य फिल्माने के बाद अर्ध नग्न फोटो शूट किये, जिससे माही गिल के पास अनेकों फिल्में और अन्य प्रोजैक्ट आये।
वीना वर्मा (लेखिका)
बुढलाढ़ा, जि़ला भटिंडा में पैदा हुई वीना वर्मा इंग्लैंड आ कर देस-प्रदेस के मालिक स्वः तरसेम सिंह पुरेवाल के संपर्क में आई और पुरेवाल के उत्साहित करने पर उसकी पहली कहानियों की किताब ‘मुल्ल दी तीवीं’ छपी। औरतों के दर्द को बड़ी बेबाकी और सैक्स का छौंक (तड़का) लगा कर लिखी गई इस एक ही पुस्तक के साथ वीना वर्मा ने इंग्लैंड के सारे कहानीकारों एक तरफ को साफ करके रख दिया। एक ही किताब के साथ वह पंजाबी साहित्य जगत में अपना नाम बना गई। उसने सारी कहानियां ही औरत के पक्ष और मर्द के विरोध में लिखी हैं। इस समय वीना वर्मा पंजाबी महिला कहानी लेखिकाओं में सब से अधिक पढ़ी जाती है।
मैंने अपनी पहली कहानी (जो औरत-मर्द संबंधों पर नहीं थी) लिखी और वह उसी हफते के देस-प्रदेस के दीवाली अंक में छप गई। जब आपका आगाज़ ही एक बड़े प्लेटफार्म से हो, जाहिर है बंदे को हौंसला तो मिल ही जाता है। उस समय इंग्लैंड में 26 कहानीकार सरगरम थे। उस अंक मे अनेकों ही महारथियों की कहानियाँ छपी थी। उसके पश्चात् पाठकों के पत्रों में सबकी कहानियों की तारीफें होती रही, लेकिन मेरी कहानी का किसी ने नाम तक भी नहीं लिया। मुझे बड़ी एहसास-ए-कमतरी सी हुई। गुस्सा भी बहुत आया कि काश कोई थोड़ा सा नाम ही ले लेता। खैर, मैनें फिर इसकी जाँच-पड़ताल की कि पता लगे कि कमी क्या थी। मैं इस निष्कर्ष पर पहुंच गया कि वैसी कहानियां मैं भले ही बीस साल तक लिखता रहूँ मेरा कहीं भी जिक्र नहीं होगा मैंने अपना रणनीति तैयार की और उसके बाद मैंने ‘चन्नी’ कहानी लिख कर पंजाब टाईमज़ को भेजी। थोड़े दिनों बाद बाई हरजिंदर सिंह मंडेर जी का खत आ गया कि एक कहानी और भेज। मैंने ‘‘अणलग्ग’’ लिखकर भेज दी। दोनों कहानियां छपी तो लोग अखबार के दफतर में फोन करके पूछने लगे कि यह बलराज सिंह सिद्धू कौन है? हमने तो पहले कभी पढ़ा, सुना ही नहीं था।
बस फिर मैने कहा कि नाचने ही लग पड़े तो घूंघट कैसा और रफतार खींच दी लिखने की। आज पन्द्रह साल हो गये मुझे लिखते हुए। बीच में पाँच साल मैंने लिखने से सन्यास भी लिये रखा। हर छोटे बड़े साहित्यक-असाहित्यक अदारे ने मुझे प्रकाशित किया है। आज तक सिर्फ तीन रचनाओं के बिना मेरी कोई रचना ऐसी नहीं, जिसे प्रकाशित करने से किसी ने इंकार किया हो। वे तीन रचनायें भी वह थी जो किसी व्यक्ति के बारे में लिखी गई थी और उस अदारे (विभाग) के साथ उस व्यक्ति की बनती नहीं थी। लेकिन इंकार करते हुये उसी विभाग ने उसकी जगह मेरे से अन्य रचना मांग के प्रकाशित की ताकि मैं नाराज ना हो जाऊं। बहुत से अदारों द्वारा मुझ से माँग कर रचना ली जाती है। लिखने के लिय आज तक न तो मुझे किसी ने कोई पैसा दिया और ही मैंने किसी से मांगा ही है और न ही मैंने कभी उम्मीद ही रखी है। हां, एक विभाग ने मुझे कहा था कि हमारे लिये निरंतर लिख तुझे इतने पैसे देंगे। मैंने उन से कहा, मेरा जो मेहनताना बनता है, आप वह इण्डिया के किसी गरीब लेखक को भेज दिया करो, मुझे पैसे की जरूरत नहीं। मैं आपके लिये लिखता हूँ। मैं गीत लिखने लगा। गीत चल पड़े। मैं मूवी बॉक्स कंपनी के पास गया और गानों का ऐवज़ मांगते हुए कहा कि मेरे गानों से आपने पैसे कमायें हैं, म्यूजि़क डायरैक्टर ने पैसे कमाये है, गायक ने पैसे कमाये है, मेरा हिस्सा दीजिए। मुझे कमरान अहमद ने हंसते हुये कहा, ‘‘सर हमें तो गीतकार स्वयं पैसे देते हैं कि हमारे गीत रिकार्ड करवाओं। आज तक किसी ने माँगे नहीं।
मैंने उससे कहा, ‘‘यही तो हमारी त्रासदी है। मैं अपने लिये नहीं गीतकार के लिये उसका हक मांगने आया हूँ। गीतकार का भी ख्याल रखा कीजिए।’’
खैर, उस ने उसी समय मुझे आठ सौ पौंड का चैक काट कर दे दिया और कहा बाकी हिसाब-किताब का साथ करते रहेंगे। कंपनी के अनुसार मैं इंग्लैंड का पहला गीतकार हूं। जिसने गीत के पैसे भी लिये और रौयल्टी भी ले रहा हूँ। उन पैसे में से मैंने एक भी पैनी का प्रयोग स्वयं हेतु नहीं किया। मेरे डैडी इण्डिया में गरीब लड़कियों की शादी हेतु धनराशि दे आये। गीतों की मुझे पी आर एस से जितनी भी रौयल्टी आती है, मैं वह साहित्य के भलाई वाले कार्य हेतु दान करता हूँ। अपने गुज़ारे के लिये हाथ-पैर और दिमाग है, जितना मर्जी चला कर पैसे बना लें। मेरी कोई भी रचना छपती है तो उसकी चर्चा चलती है और मुझे पता भी रहता है कि कितनी पढ़ी गई है। मेरी कलम ने मुझे बहुत कुछ दिया है और यहां तक कि एक बार तो मेरी जान भी बचाई है। 2014 में मेरा कहानी संग्रह ‘मोरां का महाराजा’ छपा तो इसका पहला ऑडीशन केवल 20 दिनों में ही धड़ाधड़ बिक गया और अब तक बिकती चली जा रही है यह किताब। पहली बार पंजाबी साहित्य में महाराजा रणजीत सिंह की सैक्स लाईफ के ऊपर बेबाकी से लिखा गया होगा, इसकी बिक्री का कारण था। उसके बाद शहजा़ादी डायना पर लिखे नावल ‘‘अग्ग दी लाट’’ की 1138 कापियां मैं छपने से पहले ही बेच चुका था।
यह बताने के पीछे मेरा यही मकसद है कि यदि मैं सैक्स के विषय के साथ संबंधित औरत-मर्द के रिश्तों पर आधारित कहानियां न लिखता होता तो आज मेरा कोई अस्तित्व न होता। थोड़ी देर टक्करें मार कर मैंने लिखना छोड़ देना था और अन्य लोगों की भांति चुपचाप अपनी नौकरी किये जानी थी। जब मैं लिखने लगा था, कितने ही लड़के मेरे साथ ही लिखने लगे थे। आज सब लिखना-पढ़ना छोड़ कर अपने-2 दुनियावीं काम-धंधों में लगे हुये हैं।
मेरी ये उपर्युक्त कला को सैक्स टॅच दे कर या बोल्ड हो कर काम करने वालों की मिसाल देने से यह प्रभाव भी ग्रहण न कर लेना कि अशलीलता के हथियार का प्रयोग करना बहुत आसान सी बात है। इसके लिये भैंसे जैसे सीने की जरूरत होती है और कीमत उतारनी पड़ती है। अमर सिंह चमकीले को अपनी जान की आहुति देनी पड़ी थी। किसी कंजर ने आज तक यह बात नहीं लिखी कि चमकीला अपने संघर्ष के लिये मरा नहीं, शहीद हुआ था। एक हाथ में साज़ और गर्भवती औरत और दूसरी तरफ ए.के. संतालीस। कितने बहादुर होंगे वो लोग जिन्होंने चमकीले पर गोलियां चलाई होंगी? हनी के ऊपर अनेकों अटैक हो चुके हैं, उसे अनेकों जगह शो कैंसल करके आर्थिक घाटा खाना पड़ा है। मेरे साथ भी कुछ हादसे हो चुके हैं। यहां अगली बात करने से पहले मैं एक छोटी सी कहानी सुनाता हूँ।
पंजाब सिंह लोग दो भाई थे। उनके बीच अक्सर कहा सुनी रहती थी। एक दिन गांव के सरपंच ने कहा कि तुम्हारा रोज का झगड़ा निपटे, तुम घर बांट लो और उसने बीच में से दीवार निकलवा दी। पंजाब सिंह चारपाई पर बैठा अपनी ही सोच (विचारों) में डूबा रहता। एक बिल्ला उसके आंगन में इधर-उधर दौड़ता फिरता रहता। पंजाब सिंह को लगता कि कहीं बिल्ला दूध ही न पी जाये। वह चारपाई के साथ बाँधे हुए कुत्ते की रस्सी खोलता ताकि वह डरा कर बिल्ले को भगा दे। कुत्ता जा कर बिल्ले के साथ लाड़ लड़ाने लगा जाता। पंजाब सिंह को कोई सलाह देता है, कि इस प्रकार बात नहीं बनेगी, आप कुत्ते को थोड़ा तेज करो, इसे डंडे से मारते रहो ताकि जा कर बिल्ले को दबोच सके। पंजाब सिंह बीच-2 में कुत्ते को डंडे से पीटता रहता तो कुत्ता भौं-2 कर के चुप हो जाता। लेकिन कुत्ते की आवाज सुनकर आस-पड़ोस के कुत्ते जोर-जोर से भौंकने लग जाते और थोड़ी देर भौंकने के बाद चुपकर जाते। फिर एक दिन उनके घर में सांप निकल आया और उसने बिल्ले को डंस लिया। बिल्ला मर गया। पंजाब सिंह ने सुख की सांस ली। एक दिन पंजाब सिंह के पास पड़ोसियों का बेटा आया और कहने लगा, ताया जी कैसे हो! चारपाई पर सिकुड़े हुये से क्यों बैठे हो?
पंजाब सिंह बोला, ‘‘क्या करूं बेटा पप्पू? चारपाई के नीचे तो साँप रेंगता फिरता है।’’
पप्पू ने डण्डा उठाया और साँप को मार दिया। फिर उनके नीम के पेड़ पर आ कर एक कौआ बैठ गया और कांय-कांय करने लगा। पंजाब सिंह ने अनेकों कंकड़ मारे। कभी-2 कुत्ता भी भौं-2 करता। लेकिन कौआ कौन सी परवाह मानता था, वह तो नीम पर बैठा था। पंजाब सिंह बड़ा दुखी हुआ कि एक मुसीबत टलती है तो दूसरी आ जाती है। चलो जी एक दिन कौए ने दूर किसी का टैलीवीज़न वाला एंटीना देखा और स्वयं ही उड़ कर ऊंची जगह जा बैठा। कौए के उड़ने की देर थी, उनके बनेरे (अटारी) पर कबूतर, चिडि़या आदि पक्षियों ने आ कर डेरा लगा लिया। वे बींटे करते रहते और पंजाब सिंह सफाई करता-2 सोचता कि इस से तो बिल्ला ही अच्छा था, उसके होते हुये इन पक्षियों की हिम्मत तो नहीं पड़ती थी, वहां आने की।
कहानी का संदेश (मौरल) यह है कि एक कलाकार को खत्म करने से समस्या हल नहीं होती अर्थात् एक को मारोगे तो दूसरा आ जायेगा। चमकीलेे को मारोगे तो हनी आ जायेगा। हनी बॉलीवुड चला जायेगा कोई और आ जायेगा। टहनियाँ मत काटो, जड़ को उखाड़ो। जड़ है जनता। सभी सुनने वालों को मार सकते हो तो मार दो लोग सुनते है तो कलाकार वैसी ही रचना करते हैं। कलाकार लोगों की पसंद को मुख्य रख कर ही करता है, क्या समस्या का समाधान हो गया? चमकीला तो आज भी उसी प्रकार बिक रहा है और सुना जाता है। यदि लोग अपनी पसंद बदल लें तो न कोई चमकीला वैसा गायेगा, न कोई हनी सिंह म्यूजि़क करेगा और न ही कोई बलराज सिद्धू लिखेगा। आप पंजाबी में बंद करवाओगे तो लोग हिंदी का ‘‘सरकाय लिओ खटिया जाड़ा लगे’’ सुन लेंगे या अंग्रेजी ‘‘ज्वनबी उम तपहीज ीमतम इंइल’’ या (।सस जींज ेीम ूंदजे ंदवजीमत इंइल . ।बम व िठंेम) सुनने लग जायेंगे। इसके साथ नुक्सान पंजाबी बोली का ही होगा। जब हमारी नई पीढ़ी को उनके पसंद या मतलब की चीज़ पंजाबी में नहीं मिलेगी तो वे दूसरी भाषाओं की तरफ जरूर आकर्षित होंगे। इसका परिणाम यह होगा कि हमारी नई पीढ़ी पंजाबी से दूर हो जायेगी और वह दिन भी दूर नहीं होगा, जब पंजाबी बोली कुएं के चक्के की भांति गायब हो जायेगी और ढूंढे से भी नहीं मिलेगी। जरा गंभीरता से सोचने की बात है।
हमारी तरफ तो अश्लीलता (लच्चरता) कुछ भी नहीं, पाकिस्तान वालों ने तो छोर तक छू रखा है। उनके स्टेज शो देख लो अश्लील कॉमेडी और अश्लील गीतों पर इतना भड़कीला नृत्य अंजुमन शहजादी और मीरा जैसी नृत्यांगनाएँ करती है कि लुच्चे से लुच्चा बंदा भी एक बार तो सिर झुका लेता है। 
कुछ वर्ष पहले पाकिस्तान से कुछ कलाकार इंग्लैंड शो करने आये और उनके साथ वो प्रसिद्ध गीतकार भी आया जिस ने पाकिस्तन के 95प्रतिशत तो अशलील गीत लिखे ही हैं। एक मुशायरे में हमारी मुलाकात हुई और मैंने उसको खाने पर आमंत्रित किया। निश्चित समय पर उसको लेकर मैं ब्रमिंघम लाहौर कड़ाही’ में चला गया। उसके साथ उसकी महबूब एक बहुत संुदर सी डांसर लड़की भी थी। उसकी पसंद पूछ कर मैंने नेवी रम की बोतल मंगवा ली। पाकिस्तान और हिंदुस्तान के फनकारों और सहित्य के बारे में हमारी बातें होती रही। हम तीनों को दो दो के करीब पैग आये और बोतल खाली हो गई। मैंने लीटर की बोतल और मंगवा ली। नई बोतल के ढक्कन को खोलते हुए मैंने उससे कहा, ‘‘यार वैसे तो कहते हैं कि जिनके अपने घर शीशे के होते हैं, वे दूसरों को पत्थर नहीं मारते। पंजाबी अफसानागिरी में गर्म ते मैं भी बहुत लिखता हूँ। लेकिन मैंने गीत तो साफ-सुथरे लिखे है, क्योंकि मेरा मानना है कि लिखा हुआ तो केवल वही पढ़ेगा जो उसे पढ़ना चाहेगा। लेकिन गीत जबरन उन लोगों तक भी पहंुचते हैं, जो बेशक सुनना ना भी चाहते हों। पंजाबी जुबान के साथ तो वैसे हीं बहुत बदसलूकी हो चुकी है। हमारी तरफ हिंदी और अंग्रेजी दबाव बना रही है और तुम इसे सिक्खों की जुबान कह कर नकार देते हो। जो आप गीत लिखे जा रहे है, उसक साथ तो पंजाबी का और भी बिगड़ता है। यह चीज़ बंद नहीं तो कम अवश्य कर दीजिए।’’
मेरी बात सुनकर पहले तो वह कुछ गंभीर सा हो गया। फिर कहने लगा, ‘‘आपकी बात तो सही है। लेकिन हमारी जरूरत और मजबूरी है।’’
‘‘क्या मतलब?’’
  ‘‘जवानी की अकड़ निकाल दे या इतना करीब हो जा कि बीच से तिनका भी न गुज़र पाये, जैसे ये गीत मुजरे के लिये लिखते हैं-
वह आगे कुछ कहने ही वाला था कि बीच में ही टोक कर उसकी साथी लड़की मुझे अपनी दर्द भरी कहानी सुनाने लगी। वह एक बहुत ही गरीब परिवार की लड़की थी और माँ अँधी, पिता हादसे में टाँगे गँवा बैठा था। चार बहन-भाईयों का पेट पालने के लिये उसे मजबूरन जिस्मफरोशी के धंधे में आना पड़ा। उसके बताने के मुताबिक रात होने पर भी उसे रहता कि एक आधा ग्राहक और आ जाये ताकि कुछ पैसे और बन जाएं। दूसरे दिन टूटे (नुचे) हुये जिस्म के साथ उसके भीतर उठ कर बैठने की हिम्मत भी ना होती। लेकिन मजबूरी वश उसे उठ कर फिर धंधा करने जाना पड़ता। फिर उसे खूबसूरत होने के कारण, किसी ने डांस सीखने की सलाह दी और वह स्टेजों पर डांस करके कमाई करने लगी, तो तब जा कर उसे उस नरक भरी जिंदगी से छुटकारा मिला। कुछ देर डांस करके वह उतना कमा लेती, जितना वह अपना जिस्म बेच कर हफते में कमाती थी भड़कीला (उत्तेजित) नृत्य, भड़कीले गीत पर ही किया जाता सकता है। उसके मुताबिक यदि वह बुल्ले शाह की कॉफी पर नृत्य करेगी तो कौन उस पर पैसे फैंकेगा। उसकी कहानी सुनते हुए मेरी पी हुई शराब का सारा नशा उतर गया। खुद के साथ बीती बातें बताती हुई को सुबक-सुबक रोती हुई को हमने ढेरों टिशू पेपर दे कर करके चुप कराया। उसने मुझे बताया कि पहले गर्म गीत बनते हैं और उन पर बड़ी मशूहूर लैला, सना, साईमा, मीरा, दीदार जैसी डाँसरें वीडियो बनाती है। फिर उनको देखकर वे डांस करती हैं। इस प्रकार पाकिस्तान में हज़ारों घरों के चूल्हे जलते हैं।
उसकी बातें सुनने के बाद मुझे भी महसूस हुआ कि शायद उतनी बुराई नहीं, जितनी मैं समझता था। मानवीय जीवन बोली अधिक कीमती है। इन्सान सलामत है तो बोली बोलेगा। बोली खुद ही सलामत रहेगी। इन्सान ही सलामत नहीं रहेगा तो बोली कौन बोलेगा। बोली मनुष्य के लिये बनी है, मनुष्य बोली के लिये नहीं। यदि हज़ार अच्छे गीत हैं और एक बुरा गीत लिखा जायेगा, तो कौन सा तूफान आने लगा है? लोग पीटने क्यों लग जाते है? बुरा गीत होगा तो हम अच्छे की कद्र कर सकेंगे। राम को भगवान इस लिये कहा जाता है क्योंकि उसकी तुलना रावण के साथ की जाती है। यदि रावण ना होता तो राम सिर्फ राम ही होता। यदि सिर्फ अच्छे गीत ही होंगे तो हमें उसकी तुलना करने के लिये कुछ नहीं मिलेगा।
मुझे कई लोग कह भी देते हैं कि तेरी किताबों के कवर साहित्यक नहीं हैं, बीच में जो मर्जी हो, टाईटल क्लीन होने चाहिये। मैंने जवाब दिया कि मैं अपने पाठक के साथ धोखा नहीं कर सकता। जो लेबल (शीर्षक) में लिखा है, अंदर (भीतर) भी वही मिलेगा। पंजाबी का पाठक अभी इतना मैच्योर नहीं हुआ कि आर्ट क्या होती है, समझ सके। मेरे वस्त्र के टाइटल पर लड़की अपने ब्लाऊज़ रस्सी (डोरी) खोलती है, फिर नावल में जो मैं कहना चाहता था, कहा और बैक कवर पर मेरी जैकेट का बन बंद करते हुये की फोटो (तस्वीर) है। तस्वीर मैं कोई और भी लगा सकता था। लेकिन वहां भी उसका कोई मतलब पेश किया ताकि नावल पढ़े बिना किसी को कोई संदेश मिल सके।
इंग्लैंड में रह रहा एक व्यक्ति दस बारह घंटे काम करके घर आता है तो वह अपने बच्चों के साथ वक्त बितायेगा, अपने मनोरंजन के लिये टैलीविज़न देखेगा। एक औरत काम से लौट कर घर का खाना बनायेगी। तब तक सोने का समय हो जाता है, क्योंकि सुबह उठ कर फिर काम पर जाना होता है। इतनी व्यस्त जिंदगी में समय किस के पास है लोग साहित्य क्यों पढ़े? लोगों को साहित्य की तरफ आकर्षित करने के लिये यदि मैं अपनी किताब के पच्चीस-छब्बीस पेज़ की कहानी में एक आधा काम उत्तेजित पैरा लिख देता हूं तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा है? आलोचक को एक सैक्स सीन तो दिख जाता है, उनको यह नहीं दिखता कि मेरी हर कहानी शिक्षादायक होती है। उसमें कोई न कोई संदेश होता है। मेरी कहानी सिर्फ सैक्सी नहीं शिक्षादायक भी होती है और पंजाबी सभ्यता और संस्कृति की तरफ आने के लिये प्रेरित करती है। उसमें सामान्य ज्ञान भी रहता है। हर कहानी में तकनीक के पक्ष से भी मैंने कुछ ना कुछ नया किया होता है। जो कहता है कि मेरी कहानी अश्लील है, मैं कहता हूं कि उसने मेरी कहानी पढ़ी ही नहीं। जिसे अच्छा नहीं लगता, मैं तो कहता हूं कि मुझ पर एहसान कर दो, मुझे पढ़ा मत करो।
मान लो कि पानी के जग में से गिलास भर कर यदि हम उस में से आधा पानी पीले तो इसका मतलब है कि जग वाला पानी स्वच्छ है और गिलास वाला झूठा। फिर गिलास वाले पानी को यदि जग में मिला दें तो हम कहेंगे कि जग वाला पानी जूठा हो गया है। यदि स्वच्छ होना उत्तम है और जूठा होना नीचता है? जूठा तो थोड़ी मात्रा में था स्वच्छ पानी अधिक मात्रा में था। स्वच्छजल में मिलकर जूठा पानी स्वच्छ क्यों नहीं बन सका? स्वच्छ ही जूठा क्यों बना? इसका अर्थ तो यह हुआ कि जूठे पानी में गुण अधिक थे। हमारी इंग्लैंड में 200 से अधिक पंजाबी लेखक हैं। सैक्स के बारे में लिखने वाले सिर्फ दो। एक मैं दूसरी वीना वर्मा। वीना कुछ संकोच के साथ लिखती है और दूसरा स्त्री होने के कारण बरी हो जाती है। मैं एक टायर कच्चे एक पक्के रख के गाड़ी चलाता हुआ होने के कारण सब मेरे पीछे पड़ जाते हैं। यदि सभी बाकी बढि़या लिखते हैं तो उनके साहित्य को तो मेरी कहानियाँ इस कद्र कुचल देनी चाहिए थी कि मेरा कभी कोई जिक्र ही न होता समझ नहीं आती उन्हें क्यों मुझ से ईर्ष्या है?
मेरे भीतर कोई कला है तो मुझे उसका आज फायदा होना चाहिये। मरने के बाद किसने देखा है कि तुम्हें कौन पढ़ता है, कौन नहीं। नंद लाल नूरपुरी जैसों को कुएँ में छलांग लगाकर मरना पड़ा। मुझ से ऐसा कुछ नहीं हो पायेगा। मैं साहित्यकारों के पढ़ने के लिये तो लिखता ही नहीं। मेरा साहित्य आम पाठक के लिये है और यदि मैं अपने पाठक को मज़ा देता हूं तो किसी का पेट क्यों दुखता है? अगला अपनी स्वयं की इच्छा से पढ़ता है। मैनें कौन सा किसी को तोप से बांधा होता है कि मुझे पढ़। पंजाबी का सिर्फ एकमात्र मैं ही ऐसा लेखक हूं, जिसकी रचना छपने पर कुछ लोग संपादक को सलाह देते हैं कि मुझे छापने न दिया करें। अनेकों बार तो इसके पीछे जातीय रंजिश होती है।
लीजिए इसके बारे में भी एक छोटा सा किस्सा हो ही जाये। एक व्यक्ति की नई-2 शादी हुई थी और उसने लोहड़ी पर अपने सभी दोस्तों-मित्रों को आमंत्रित किया। जब वे पार्टी के बाद जाने लगे, तो वह कहने लगा कि इसी तरह ही सब ने अगले साल भी लोहड़ी पर आना है, सुख से हम दो से तीन हो जायेंगे। चलो जी अगले वर्ष की लोहड़ी भी आ गई, लेकिन उसके बच्चा नहीं हुआ, उसके किसी अन्य दोस्त के हो गया। सभी दोस्त वहां इकट्ठे हो गये। उसके अगले किसी वर्ष और का बच्चा हो गया। इस प्रकार पांच सात वर्ष निकल गये और उस व्यक्ति के दोस्तों में किसी न किसी के बच्चा होता रहा, लेकिन उसके कोई औलाद नहीं हुई। आठवें वर्ष उसका कोई और दोस्त उसको लोहड़ी की पार्टी का निमंत्रण देने आया तो उस व्यक्ति को भीतर से बड़ा महसूस हुआ कि मेरे तो बच्चा नहीं हुआ। बदहवासी में वह लोहड़ी के लिये निमंत्रण देने आये अपने दोस्त को कहने लगा, ‘‘लोहड़ी मनाने से पहले डी.एन.ए. करवा लेना था। पक्का पता लग जाता, बच्चा तेरा ही है।’’
‘‘मुझे डी.एन.ए. करवाने की जरूरत नहीं। तू डाक्टर से मर्दाना ताकत की दवाई ले ले, तुझे अवश्य उसकी जरूरत है।’’ उसके दोस्त ने जवाब दिया।
मेरे बारे में कई लेखक कह देते हैं कि मैं स्टंट (विवादपूर्ण लिखकर) करके चर्चा करवा जाता हूं। उनको मेरा कहना है कि तुम स्टंट कर लो, तुम से नहीं होते।
एक लेखक की मूर्खता का प्रदर्शन तो यहां तक देखो मेरे ब्लॉग पर ही टिप्प छोड़ता है कि और भी लेखक है आप उन्हें प्रकाशित किया करो, बलराज सिद्धू की कहानी ही छापते रहते हो। ऐसा करके लोग अपना ही जलूस निकाल लेते हैं। अखबार के संपादक के पास भी दिमाग होता है उसे भी पता रहता है कि उसने क्या छापना है और क्या नहीं। यह बात तो इस तरह है कि जैसे आप करियाने (किराने) की दुकान से भले ही कितना राशन लेते हो और आप दुकानदार से कहो कि मुझे ब्लॅडप्रेश्र है, तुम देसी घी मत रखा करो अपनी दुकान पर कहीं मुझे हार्ट अटैक न हो जाये। दुकानदार आपकी समझदारी पर हसेगा ही। भाई तुम्हें जो चीज़ नहीं पचती, मत खाओ। घी अन्य लोगों ने तो लेना है ही। कहने पर दुकानदार घी का टिन सड़क पर तो नहीं फेंकने लगा। जब तुम पढ़ोगे ही नहीं फिर मेरी कहानी तुम्हारे क्या दांत करती है। वास्तव में इसके पीछे लोगों की हीन भावना छुपी होती है। डर होता है कि यह चीज़ अधिक पढ़ी जायेगी, और इसके साथ उनकी रचना गुड़ी हो जायेगी। हमारे यू.के. से पंजाब टैलीग्राफ अखबार निकलता है। मैंने शुरुआती दिनों में, मुझसे जो सहयोग हो सका, दिया। एक लेखक के साथ मेरे कुछ निजी मतभेद हैं। अखबार का संपादक रामदास मुझे उसका नाम लेकर कहने लगा कि यार उसकी रचना आई है, कैसे करें? मैंने बिना देरी किये उसे कहा कि जहां मेरी रचना छपती है उसके बराबर छाप देना, मुझे क्या ऐतराज है। मुझे तो बल्कि मुकाबला करने में मज़ा आता है जब कुंडियों के सींग फंसते हैं, फिर ही पता चलता है कि बडेवें खाने वाली कैसे जीतती है।
चाहे वह हनी है, चाहे चमकीना या कोई और हो, कभी भी देख लेना कि जो अश्लील का सहारा लेता है, वह बहुत टैलेंटड व्यक्ति होगा। यदि हनी के गीत बुरे हैं, मैंने एक बार सुन लिये, मुझे पसंद नहीं आये तो मैं जिंदगी में वे दुबारा नहीं सुनूंगा। लेकिन मैं हनी के दूसरे किये कामों के लिये उसका फैन हूं और मेरी तमन्ना है कि काश! कभी वह मेरे किसी गीत का म्यूजि़क करे। मैं नहीं कहता कि उस पर कोई पाबंदी लगाओ। हनी तुम्हारे सर पर पिस्तौल तान कर अपने गाने सुनाता है? चैनलों को पैसे देकर वो गाने लगवाते हैं। नहीं ‘अच्छा लगता तो कोई और चैनल देख लो।
आप सौ लोगों को पकड़ लो, उनमंे से आपको मुश्किल से सौ बंदे भी नहीं मिलेंगे, जो पंजाबी साहित्य पढ़ते होंगे। मैं सीना ठोक कर कहता हूं कि मैंने अपने लिये नये पाठक पैदा किये। जिन्होंने कभी साहित्य पढ़ कर देखा ही नहीं था, मैंने उन्हें पढ़ने का चसका डाला। मैं ऐसा इसलिये कर सका, क्योंकि मेरी कहानियों में सैक्स का वर्णन रहता था। साफ-सुथरी कहानी लिख के आप मुझे कर के दिखा देना, मैं भी वैसे ही कर लिया करूंगा। जो मुझे पर अश्लीलता फैलाने का इल्ज़ाू लगाते हैं, उनको मेरा यह जवाब है कि मेरे किसी गीत पर उंगली रखके दिखाओ। क्या कभी सोचा है कि मेरे गीत साफ सुथरे क्यों हैं? जो कलम ‘अणीलग’ या ‘नंगीआ अखीयां’ कहानियां लिखती है, उसी कलम ने ‘ऊधम सिंह और माछीवाड़ा जंगल’ लिखे हैं। कहानी लिखने में मुझे महीना-महीना लग जाता है और गाना लिखने के मैंने पाँच मिन्ट से अधिक समय नहीं लगाया। यदि पांच मिन्ट में कोई गीत पूरा न हो तो जितना लिखा गया हो, मैं वहीं फाड़ कर फेंक देता हूं आगे लिखता ही नहीं। अश्लीलता फैलानी होती तो गर्म गीतों की झड़ी लगा कर मैं सब कहीं फैला देता। मैं इस इल्ज़ाू का खण्डन करता हूं। 
अशलीलता का दोष लगाने वाले कई कह देते हैं कि हनी अपनी मां-बहन को गीत सुनाओ। हनी ने यू-टयूब पर गीत डाल दिया। वहां से कोई भी सुन सकता है। उसने आपको कार्ड डाला था कि मेरा गीत सुनो। इसी प्रकार मेरी किताबें भी मेरे घर में पड़ी हैं, मेरे घर वाले पढ़ना चाहें तो पढ़ सकते हैं, मैं कौन सा रोकता हूं। इल्ज़ाम वह लगाओ, जो सही हो और जिसकी दूसरे व्यक्ति के पास कोई सफाई न हो।
कईयों को मेरे द्वारा प्रयोग किये गये शब्द भी चुभ जाते हैं, उसका जवाब मुझसे पहले बलवंत गारगी ने बहुत खूबसूरत लिखा है कि हमें यदि स्त्री की छाती की बात करनी है तो उसे मेज़ लिखा करें या कुर्सी?
आम लेखक का विचार है कि रचना संक्षिप्त होनी चाहिये, पाठक के पास समय नहीं, कोई पढ़ता नहीं। मैं कहता हूं, ‘‘कौन कहता है कि आसमां में सुराख नहीं होता, कोई तबीयत से पत्थर मारे तो सही।’’ यदि आपकी कलम में दम नहीं, तो आपकी मिनी (संक्षिप्त) कहानी भी किसी ने नहीं पढ़नी, यदि दम है तो दिल्ली से लाहौर तक के फासले जितना भी लिख दो, लोग पढ़ेंगे। मैं जानबूझ कर लंबी रचना लिखता हूं। मैंने शेख-फरीद, गुरु नानक देव और अन्य धार्मिक विष्यों पर भी लिखा है। मुझे आज तक किसी ने नहीं कहा कि हमने वह पढ़ा है। फिर मैं बताओ क्या करूं? मैं सिर्फ कहानियां ही नहीं लिखता और भी बहुत कुछ लिखा है। इंग्लैंड में मुझसे पहले साहित्यकारों के जीवन और उनकी रचनाओं के बारे में निरंतर नहीं लिखा था। मैंने ‘लफजां दे दरवेश’ कॉलम लिख कर कईयों को हाईलाईट किया। यदि मैं एक कहानी सैक्स पर लिखता तो उसके मुकाबले दस और साफ सुथरी साहित्यक रचनाएं भी लिखता हूं। इसलिये आलोचना (बूराई) करना छोड़ो और सृज्नात्मक बनो। 
अश्लील गायन के बारे में लोगों को समझ आई है। वर्षों से गाँव शंकर और छपार के मेले में अश्लील बोलियां (गायन) की प्रथा रही है। उन बोलियों (गानों) के सामने तो ये गीत कुछ भी नहीं है। यू-टयूब पर उनकी रिकार्डिंग डाल देंगे, सुन कर बताना फिर ऐसे ही खाली हाथ बैठने वालों ने कॉय-2 मचा रखी है क्या गल्त है ‘‘लक्क टवैंटी एट’’ में? गुरदास मान ने लिखा और गाया ‘मुंदरी दे छल्लले जिन्ना लक्क’ और बाबू सिंह मान ने लिखा था ‘लक पतला हुलारे खांदा, चरी दा टांडा’ फर्क क्या है? आज समय के हिसाब से लक (कमर) की खूबसूरती को ब्यान करने के लिये साईज़ कह दिया गया। मतलब तो इन वाक्य का यही है कि पतली कमर है।
वारिस शाह ने कोई कम गंद डाला है, कहीं, जब लिखता हैं, ‘‘वारिस शाह जे रन दयाल होवे...।’ इससे अगली पंक्ति पढ़ कर बताओ अश्लील है या नहीं। उसको तो कोई कुछ नहीं कहता। गुरदास मान ने एक गीत गाया था, ‘नच नी नच नी, मुंडे गभरू जवाना कोलों बच नी, अजकल दे जवान मुंडे निरे ने तुॅान लैण कंच्च दे गिलास वांगू चक नी।’ माणक ने गाया था ‘नी ऐदां तैनू रगड़ सिटूं, जिवें रगड़ी कूंडे दे विच मेहंदी। सुरिदर कौर ने कौन से गर्म गीत नहीं गाये, वह आपकी कोयल हो गई। हम तो आज लिखने लगे हैं, पिछले चालीस वर्षों से कैलाश पुरी सैक्स बारे शैयया सहभागिता, सेज मल्हार लिखी जा रही है। उसको तो कभी किसी ने नहीं कहा। हम चार अक्षर लिख दें, कूदने लग जाते हैं लोग। कैलाश पुरी पर स्वः बहादुर साथी ने चुटकुला भी जोड़ा हुआ है। जो इस प्रकार हैः-
सुरजीत सिंह कालड़ा, हरिंदर सिंह बजाज और गुरदीप सिंह पुरी ने मिल कर एक फाईनैंस कंपनी बनाई। दफतर के उदघाटन के लिये डा. गुपाल सिंह पुरी को निमंत्रण दिया। उद्घाटन वाले दिन डा. पुरी को अचानक खुद मौके पर पहुंचना तो असमर्थ हो गया, लेकिन उन्होंने अपनी पत्नी कैलाश पुरी को भेज दिया।
उदघाटन की रस्म के पश्चात् कैलाश पुरी ने आर्थिक समस्याओं पर बोलने के स्थान पर पूरा घंटा सेज उलझना और सैक्स समरूाओं संबंधी ही प्रधानगी भाषण देकर अपना फजऱ् पूरा कर दिया।
शाम को घर आकर जब डा. पुरी ने फंक्शन के बारे में पूछा तो कैलाश पुरी ने बड़े फकर से बताया कि लोगों ने मेरे भाषण को एक-एक शब्द बड़े आराम से सुना। डाक्टर पुरी ने जरा संदेह से हैरान होते हुये पूछा, ‘‘आप बोल किस विषय पर ोि?’’
कैलाश पुरी ने अपनी कमज़ोरी को छुपाने के लिये झूठ ही कह दिया, ‘‘बस मौजूदा आर्थिक दशा (स्थिति) के बारे में...।’
दूसरे दिन डा. पुरी को अचानक फाईनैंस कंपनी के दफतर में किसी काम से जाना पड़ गया। डा. पुरी को देखते ही सारे स्टाफ मैंबर बड़े खुश हुये और कैलाश पुरी की तारीफों के पुल बांधने लगे। यह सब कुछ सुन कर डा. पुरी ने कहा, ‘‘देखिये भाई साहब! मेरी पत्नी कैलाश पुरी जी कल यहां जिस विषय पर बोल गर कोई हैं, सत्य माने तो उसके बारे में तो वो ए, बी, सी भी नहीं जानती।’’
हम उस धरती पर पैदा हुये है जहां दुनिया की सबसे पहली संभोग शिक्षा की पुस्तक लिखी गई। ऋषि वात्साययन का कामसूत्र और कोके पंडित का कोक शास्त्र जैसे ग्रंथ रचे गये हैं। सैकस को आधार बनाकर कहानियां लिखने में क्या बुराई है? मैं एक समस्या के बारे में लिख रहा हूं। रामायण और महाभारत और-मर्द के संबंधों पर आधारित है। सैक्स की समस्या बीते हुये कल में भी थी, आज भी है और आने वाले कल को भी रहेगी। आजकल इतने तलाक हो रहे हैं, उनका कारण भी यही समस्या है।
साहित्य समाज का दर्पण होता है जो समाज में घटित हो रहा है, मैं वहीं लिख रहा हूं। सैक्स का जितना वर्णन मेरी कहानियों में है, उससे कहीं अधिक तो हम टी.वी. या अपने चारों ओर शरेआम देखते हैं। हमारे इंग्लैंड में तो आप घर से बाहर निकलो तो कोई न कोई जोड़ा मुंह से मुंह डाले चूमता नज़र आ जायेगा। इंग्लैंड में ब्राईटन नाम का एक नगर है, उसके समुद्र तट का एक हिस्सा ऐसा है, जाहं आप कपड़े पहन कर नहीं जा सकते। जिंदगी की धुरी ही सैक्स है। सैक्स की वजह से ही हम इस दुनियां में आये है। सैक्स एक सुप्रीम पॉवर है, जिसने मारकंडे जैसे ऋषि को भी पागल कर करके सरस्वती के पीछे लगा दिया था। विश्वामित्र की तपस्या भंग करवा दी थी। फेरे बीच में छोड़कर आने वाले गुरसिक्ख भाई जोगे के पिशावर की नयनिया (नृत्यांगना) के कोठे पर चढ़ा दिया था।
खजुराहो जैसे भारत के अनेकों मंदिरों के बार स्त्री-पुरुष को भिन्न-भिन्न आसनों में आलिंग्नबद्ध होते हुये दिखाती मूर्तियां बनी हुई मिलती हैं। उनका मंदिरों के बाहर बनाने के पीछे दो मकसद थे। एक तो सैक्स के बारे में शिक्षा देनी और दूसरा कि उनको देख कर यदि तुम्हारा काम भड़कता है तो इस का मतलब है कि अभी तुम मंदिर के भीतर जाने के काबिल नहीं हुये। आप सैक्स से उपर उठ कर मंदिर में आओ। अब सैक्स से तभी ऊपर उठा जा सकेगा, यदि उसके बारे में खुल कर विचार चर्चा होगी। अश्लील पंजाबी साहित्य या गानों में तो रोक लोगे। हिंदी अंग्रेजी में कैसे रोकोगे? यह अश्लीलता न तो कभी रूकी या समाप्त हुई है और न ही कभी रूकेगी। इसलिये इसके बारे में चिंतित होकर फिजूल वक्त खराब न करो। इसके मुकाबले तो अच्छा सृजन कर सकते हो, करो। किसी कलाकार को टैलीफोन या फेसबुक पर गालियां निकाल लेना या मारपीट कर लेने से कुछ भी हल नहीं होने लगा। जो होता है होने दो। अंग्रेजी की कहानी है, ‘‘ॅीमद जीम तंचम पे नदंूंपेजमक जीमद मदरवल पज’’ अर्थात् जब बलात्कार को रोकना असंभव हो तो उस सैक्स का मज़ा ले लेना चाहिये।

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