Saturday, 23 July 2016

स्.6

हीर की गाथा
पंजाबी की सब से अधिक पढ़ी लिखी, सुनी और गायी जाने वाली प्रसिद्ध प्रेम कथा है हीर। हीर का किस्सा लिखने में दो नाम ज्यादा मशहूर हैं, एक दामोदर और दूसरा वारिस शाह। पंजाबी के लेखकों को इतनी मुसीबत पड़ गई कि ढाई सौ से अधिक लेखकों ने हीर लिख दी। वारिस शाह या दामोदर के साथ उनकी तसल्ली नहीं हुई। अभी भी यह प्रचलन जारी है।

दामोदर, वारिस से बहुत पहले हुआ है। वारिस अपनी रचना में हीर के किस्से के उपर अपनी मौलिकता का दाव नहीं करता, वह यह स्पष्ट कर देता है कि उसके समय हीर गाथा लोगों की जुबान के ऊपर आम रहती थीः-
यारां असां नू आण सवाल कीता, इश्क हीर दा नवां बनाईयेजी ऐस प्रेम की झोक दा सब किस्सा, ती भा सोहणी नाल सुणाईये जी रज़मा माअनियां विच्च खुशबू होवे, इश्क मूश्क नू खोल विखाई नाल अजब बहार दे शेयर कहके, रांझे हीर दा मेल मलाईये जी। वारिस शाह रल नाल प्यारियां दे, नवीं इश्क की बात हिलाईये जी। और हुक्म मन के सजणा प्यारियां दा किस्स अजब बहार दा जोडि़या ई।
फिकरा जोड़ के खूब दरूस्त कीता, नवा फूल गुलाब दा तोडि़या ई। वारिस शाह फरमाया प्यारियां दा, असां मंनिया मूल न मोडि़या ई।(5) या लेकिन दूसरी तरफ दामोदर अपने किस्से में आरम्भ से लेकर अंत तक यह ढिंडोरा पीटता है कि यह इसकी अपनी रचना है और वह सारी कथा का चश्मदीद गवाह है। दामोदर गांव वलारा, तहसील चनिओट का गुलाटी जाति का अरोड़ा हिन्दू क्षत्रिय था और उसके अनुसार उस ने चूचकाने (झंग (पेड़) उस समय अस्तित्व में नहीं आया था और झंग की नींव चूचक के भतीजे ने मल खान ने चूचक की मौत (1462 ई.) के बाद 1464 ई. में रखी थी और 1466 ई. में लाहौर दरबार से पट्टा भी लिखवाया था।) हीर के गांव में हाट (दुकान) कीथीः-
अख्खीं डिठ्ठा किस्सा कीता, मैं ता गुणी न कोई
शऊंक शऊंक उठी है मैंडी, ता दिल उमर होई।
असां मुंहो अलाईया ओह, जो कुछ नज़र पइउोई।7।।
आख दामोदर अग्गे किस्सा, जोई सुने सब कोई। ते
आख दामोदर से डिठ्ठा अख्खी, जो कन्नी सुनदे आहे।447।या
आख दामोदर कुफर मैं अख्खी डिठ्ठा, जो वेखे सोई सलाहे।4461
यहां दामोदर कुफर तोल रहा है, क्योंकि हीर की गाथा या तो उस समय बहुत प्रचलित थी और दामोदर से पहले और बाद में बहुत सारे कलमकारों ने उसके हवाले (वर्णन) अपनी रचनाओं में दिये हैं। मादवानल काम कंदला, गोपी जन के बिलास और अकबर का दरबारी कवि रंग भट्ट ‘रगड़ा हीर रांझे काजी जी का’ कविता आदि पहले ही लिख चुके थे। आम तौर पर गायक नृतक दरबारी कवि आदि हीर का किस्सा गाया करते थे। भाई गुरदास (1551 ई. - 1628 ई.) जी भी दामोदर और हीर-रांझे का जिक्र करते हैंः-
तुलसा भहुरा भगत है दमोदर अबाल बलिहारा।
(वार वीं पीढ़ी वीं पंक्ति 6वीं)
रांझा हीर वखाणिये, ओह ‘‘पिरेम पिराती’।
पीर मुरीदां पिरहड़ी, गावन परबाती। वार 17वीं दामोदर से पहले बाकी कोलाबी की ओर से ‘मनस्वी हीर रांझा’ फारसी में लिखित होने के प्रमाण भी मिलते हैं। दामोदर का समकाली बुज़ुर्ग शाह हुसैन अपने कलाम में अनेकों बार हीर की उदाहरण देता हैः-
1. रांझा जोगी मैं जुगियानी, कमली कर कर छाडिया।
2. जे तू तख्त हज़ारे दा साई असीं सियाला दीयां कुडि़या
3. हीर नू इश्क चिरिका आंहा, जा आही दुत वाती।
सौ वरियां ही ज़हमत जाते, जे रांझण पावे झाती।
दामोदर के बाद गुरू गोबिन्द सिंह (22 अक्तूबर 1666-7 अक्तूबर 1708) भी संकेत देते हैंः-
यारड़े का मैनूं सथ्थर चंगा, भट्ठ खेडि़या का रहना। दामोदर ने किस्सा अकवर (15 अक्तूबर 1542-27 अक्तूबर 1605) की हकूमत के समय आरम्भ करके जहांगीर के राजगद्दी पर कब्जा (24 अक्तूबर 1605 ई.) होने करने के बाद खत्म किया। इस रचना का काल 1600 ई. से 1615 ई. माना जाता है। उस समय पंजाब में सियाल, चंदड़, खेड़े और रांझे प्रमुख जातियां थी। जिन्होंने झंग, रंगपुर और तख्तहज़ारे आदि गांव बसाये। दामोदर के समय में न तो इंटरनैट था और न ही टैलीविज़न कि यह समझ ले कि एकता कपूर ने सीरियल बना कर हीर को रातों-रात घर पहुँचा दिया होगा। हाजि़र है कि हीर की प्रेम कथा को प्रचलित होने में बहुत सारा समय लगा होगा।
‘‘वारिस शाह का जन्म 1720 ई. से लेकर 1740 ई. के बीच का और देहांत 1784 ई. से 1789 ई. के बीच का माना जाता है।
सन् यारां सै अस्सियां नबी हिज़रत, लम्बे देश तैयार होई दे विच्च अठारह सै तरेई संगतां दा, राज विक्रमाजीत दी सार होई जदो देश ते जट सरदार होए, घरो घरी जा नवीं सरकार होई अशराफ खराब कमीन ताज़े, जिमींदार नू बड्डी बहार होई चो चौधरी, यारनी पाक दामन, भूत मण्डली इक तो चार होई चारिस जिनहाने आखियापाक कलमा, बेड़ी तिन्हा दी काबत पार होई। इन मिसरों से पता लगता है कि ‘हीर’ 1180 में पूरी हुई 1180 हिज़री 9 जून 1766 ई. से शुरू होकर 29 मई 1766 ई. तक जाता है, पर संवत् 1823 विक्रमी 17 मार्च 1766 ई. से शुरू होकर 14 अप्रैल 1767 ई. को खत्म होता है। यह वह समय था जब सैयद वारिस शाह ने हीर पूरी की, पर इस बात का कोई पक्का सबूत नहीं मिलता कि उन्होनंे किताब कितने समय में लिखी।’’ (जाहिद इकबाल, हीर वारिस शाह में मिलावटी शेयरों का वर्णन, पृष्ठ 121)
हीर के किस्से को अधिक कहानीकारों की ओर से रचे जाने के पीछे कहानीकारों का अपने आप की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने का रहस्य छुपा हुआ था। हाफिज़ बरर्खुदार ने जाफ़र खान के लिए 1090 ई. में ‘यूसुफ जुलैखां’ का किस्सा लिखा और इसके बदले में पर्दाथक खजाने प्राप्त किये। हीर के एक से अधिक किस्से लिखने के पीछे उस समय के कवियों की यही लालसा था कि वह राज्य या दरबारी कवि बन सके। यही कारण है कि हीर के रचनाकारों ने अपने समय के हाकिमों की अपने आप किस्से में बड़ाई की है। जैसे दामोदर ने जगह जगह अकबर का जिक्र किया और यह सिद्ध करने की कोशिश की है कि हीर अकबर के राज्यकाल में पैदा हुईः-
अकबर नाल करेंदा दावे, भुई नई दा साईं।91
हिके दिवीहां अकबर गाज़ी, कच्छा आप कछीह।13)
अकबर शाह दा राज डढेरा जे तेनू कज़ा दित्ती आई।
आख दामोदर सुण मियां काज़ी, मैं भी राठां जाई।920।
सुन हीरे तू नोंह है कैदी अर धी कैदी आही?
अकबर नाल जुडेदंे पलू, भुई नई दे साईं। 931
पातशाही जो अकबर संदी, दिन दिन चढ़े सवाये।
आख दमोदर कडो दे असीसां, शहरांे बाहर आये।964।
दामोदर हीर की माँ का नाम चौधरानी कुंदी लिखता है और वारिकस मल्कीः-
वाह सिकदारी चूचक संदी, भली गुजारन लंघाई।
आख सिरदारी चूचक संदी, भली गुजारन लंघाई।
आख दमोदर वार बुढे दी, महिरी कुंदी विआही।41 हीर दमोदर सुण मलकीये अमडि़ये मेरिये नी, जिच्चर जान, रंझेटे तो ना टलस भावे वड्ड के डकरे करन मेरे, वंझ कर्बला हो शहीद मरसां। वारिस शाह जे जींवदी मरांगी मैं, लेली मजनूं दे नाल मैं जा रलसा। (हीर, वारिस दामोदर हीर की नन्द सैहती का इश्क रामू ब्राहमण से करवाता है और वारिस शाह मुराद बलोच से। 
जिहड़ा साहिब चार असाड़ा, ओह दिसींदा नाहीं।
अख्खी दा सुख ब्राहमण रामू, जय मुल खरीदी आही।
जे आज न आया नजर असानूं, ता जीवन जोगी नाहीं।
सुण हीरे के तैनू आखां, बणी जु बाब असाहीं।631।।हीर दामोदर 
(सहती हीर का वार्तालाप)
मिले शाह मुराद ता मोई जीवां, मैं ताजाणांगी आज अराम कीता- हीर वारिस।
दामोदर हीर की 360 सहेलियां लिखता है।
तै सै सठ सहेली जोड़ी, जेहड़ी जेहड़ी भाई।
कहे दमोदर वाह सलेटी, धन चूचक दी जाई 1461 और वारिस केवल साठ।
ले के साठ सहेलियां नाल आई, हीर मतड़ी रूप गुमान दा जी। वारिस शाह मीयां जहीं जहर लुट्टी, फिर भरी हंकार दे माण दी जी। दामोदर किस्से का अंत सुखांत में करता है और वारिस दुखांत में। दामोदर घोड़ो की किस्मों का वर्णन को विस्तार देता और वारिस भैसों की नस्लें बता कर बड़ी-बड़ी बातें झाड़ते है। दामोदर ने जहां हीर का हुस्न ब्यान करने में संकोच किया है, वहाँ वारिस ने हीर को पूरा स्वाद लेकर लिखा है। वारिस ने हीर के अंग अंग की ऐसे तरीफ की है पढ़ कर ऐसा लगता है कि फरांसिसी (फ्रांसिसी) चित्रकारों की तरह वारिस ने हीर को वस्त्रहीन करके अपने सामने मॉडल बना कर कहा हो, ‘‘हीरे ला तेरे ऊपर किस्सा लिखें’’ वारिस की ओर से हीर के फिगर की तस्वीर का वर्णन देखोंः
छाती ठाठ दी उभरी पट खेनू, सैऊ बलख दे ख्ुणे अम्बार विच्चो।
धुनी बहशत दे हौज दा मुसक कृपा, पेडू मखमली खास सरका विच्चो।
काफुर शहिना सुरीन बांके, हुस्न साक सतून मीनार विच्चो
शाह परी दी भैण पांच फूल राणी, मूझी रहे ना हीर हजार विच्चो।
छाती (ठतमंेज) नाभि (ठमससल ठनजजवद), शुरीन (ठनजजवबो) गिना के बाद ओर कुछ बचता ही नहीं। पर वेग में आये सूफ़ीवादी वारिस ने हीर के सिर से पैरों तक कोई अंग नहीं छोड़।।
हीर इतनी दलेर (बहादुर) होती है कि लुंडण को बचाने के लिए नूरे संम्बल और अपने ताऊ कैदो, जिसको वारिस चाचा कैदो बताता है, के साथ लड़ने से गुरेज़ नहीं करती। पर काज़ी उसका जबरदस्ती से निकाह पढ़ देता है? वह सबला से अबला बनकर डोली में बैठ जाती है।
वारिस हीर के शादी के समय डूमं, मरासी और काजी रखता है। उसके उल्ट हीर के निकाह के लिए दामोदर के साथ पंडित भी भेजता है और निकाह के समय हिन्दु रीती-रिवाज़ करवाता है। इसका साफ और एक मात्र कारण दामोदर का हिन्दु और वारिस का मुसलमान होना है।
क्रिशन बांसुरी बजाता था और गायों को चराता था। ये आईडिया चोरी करके दामोदर ने रांझे पर फिट कर। दामोदर रांझे के हाथ में बांसुरी पकड़ाकर उसको भैंसे चराने लगा देता है। अब सवाल यह पैदा होता है कि हीर किस्से का मूल स्त्रोत आया कहां से?
तीसरी शताब्दी में ग्रीक मिथिहास में एक प्रेम कह ‘अलोरा-अज़ोना’ की लिखी गई और व्यापारियों और धर्म प्रचारकों के द्वारा वह दुनिया में फैल कर मशहूर हो गई। शेक्सपीयर उसको वरोना उठाकर ले गया और उसने ‘रोमियों जुलीयट’ बना ली। पुरातन काल के कहानीकार उसको गोआ ले गये और ‘डोना पोला बना दिया। चीनी ने ‘लीआंग जहू’ नाम दे दिया। दामोदर ने ‘हीर रांझा’ बनाकर पेश किया। कहानी वही है और सब कुछ घटित उसी तरह होता है, फर्क सिर्फ इतना है कि हर कलमकार ने अपने जीवनकाल, रीति-रिवाज, सभ्यता, धार्मिक और स्थानीय जगह का वर्णन देकर अपनी कहानी को यर्थाथक बनाने में कसर नहीं छोडी। हालांकि यह एक काल्पनिक कहानी है। जिसको साहित्यक चोरों ने चोरी करके अपने-अपने थैले में डालकर बेचा।
श्रनेज वित ।तहवउमदजश्े ैंाम! एक पल के लिए यदि यह मान भी लें कि बहुत सी प्रेम कहानियां इसी तरह घटती हैं और हीर सच्ची पैदा हुई तो एक विचार करने वाली बात यह है कि लेखक कब लिखते है? लेखक जब लिखता है, जब उसको समाज में कुछ गलत घटित होता दिखाई देता है। अब हीर के किस्से का भी अर्थ तो यही लिखा जाना चाहिए कि यह जो समाज के गलत हुआ है। आगे से होना नहीं चाहिए।
हीर एक बददिमाग, बदमिज़ाज, जिद्दी और बिगड़ी हुई अमीर लड़की थी।
उसने न केवल अपने पिता की इज्जत खराब की, बल्कि कुंवारी होते हुए नाजायज़ रिश्ता भी रखा। शादी के बाद पति से बेवफाई की न तो ढंग से प्रेमी की हो सकी। न ही पति के प्रति वफादार हुई। हीर अपने सारे कर्त्तव्य पूरे करने में असमर्थ रहती है। उसमें सिवाये हुस्न के ओर कोई गुण न था। उधर छीदो आलीसी और अव्वल दजऱ्े का निकम्मा। जो जिन्दगी में कोई काम न कर सका। भाभियों के साथ छेड़खानी करता रहता था। भाइयों ने थप्पड़ परेड़ करके घर से निकाल दिया। वह खाली बांसुरी बजा कर उसके ढूंढता रहता था। यही रंग उसने इश्क में चढ़ाया। हीर गंवाकर फिर से ढूंढता फिरे। पुराने समय में डाकू लुटेरे डोली लूट लिया करते थे और लड़की के मायके वाले खास तौर पर भाई बारात की की फौज में वृद्धि करने के लिए रक्षक बनकर डोली के साथ जाया करते थे, जो रस्म आज भी कुछ क्षेत्रों में कायम है। रांझा भी हीर के भाइयों में शामिल होकर डोली की रखवाली के लिए साथ गया था। रांझे का हीर के साथ इश्क देखो कि हीर को दहेज में मिली भैंसे उसके ससुराल रांझा खुद छोड़कर आता है और बाद में हीर को मिलने के लिए अपने कम्पयूटराइज़ड दिमाग के साथ ऐसे बहाने ढूंढता कि न सिर्फ हीर की विवाहित जिन्दगी बर्बाद करता है। बल्कि उसकी नन्द को भी बद्चलन बना देता है। इस सारे किस्से में कैदो का विलन बनाकर रख दिया है। भतीजी कोई गलत काम कर रही हो तो कौनसा ताऊ या चाचा उसको डांटना नहीं चाहेगा? घरवालों के धुत्तकारे गये रांझे को चूचक ने शरण और नौकरी दी। वह उसकी इज्जत के साथ खेला। हमारी पंजाबी लेखकों की तीव्र सोच देखो, बजाये यह कहने के कि कोई हीर पैदा न हो। कोई लड़का रांझे की तरह न बने। पंजाबी लड़के मेहनती हों और लड़कियाँ भरासे के लायक हों। वह रोल मॉडल के तौर पर हीर रांझे को पेश करके पूरा जोर लगा रहे हैं और पंजाब की हर लड़की को हीर बना देखना चाहते हैं। हर पंजाबी लड़के को रांझा। हमारे पंजाबी लेखक हीर की तरह लड़की के साथ शादी करवाने भी अपनी रचनाओं में प्रेरणा देता है, जो कि एक बद्चलन औरत थी। हमारे साहित्यकार तो चरित्रहीन स्त्रियों के साथ घर बसाने के लिए उत्साहित कर रहे हैं।
हीर का मकबरा बना कर वहां नवविवाहित जोड़े अपना साथ निभाने की मन्नत मानने के लिए जाते है। जैसे माता हीर तो सात जन्मों का साथ निभा गई होती है। कुछ साहित्यकार और विद्वान हीर रांझे के इश्क को आत्मिक भी बताते हैं, जबकि वह खालिस इश्क मिज़ाजी थे और निरोल जिस्मानी आकर्षण (शारीरिक खींच) से उत्पन्न हुआ रिश्ता था। आत्मिक इश्क के लिए विपरित लिंग का चुनाव क्यों किया गया? आत्मिक इश्क तो समलिंग के साथ भी निभाया जा सकता है। उसके लिए शारीरिक रूप में इक्ट्ठे होने की क्या जरूरत। हीर दूसरे के घर में पैदा हुई खुशी है और मिजऱ्ा गायकों द्वारा गाया सुनने को ही सुन्दर लगता है। कोई नहीं चाहता कि मिजऱ्ा उनके दर पर उनकी बहन-बेटी को लेने के लिए खड़ा हो। यह प्रीत के किस्से ऐसे प्रेमी न पैदा करने के लिए लिखे गये हैं, न कि पैदा करने के लिए।

No comments:

Post a Comment