Saturday, 23 July 2016

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शांती के पुंज: बाबा शेख फरीद जी

इतिहास गवाह है जब कभी भी अत्याचार, कुकर्म, पाप, जुल्म बढ़े हैं, बुराईयां भलाई पर भारी पड़ी हैं, शांति भंग होकर अशांति बढ़ने फूलने लगी है। परमात्मा ने किसी न किसी पीर, पैगम्बर, संत, फ़कीर, आलौकिक अर्थात किसी महान शख़्सीयत को शांति दूत बनाकर अमन की स्थापना करने और मार्ग दर्शन करने के लिए धरती पर भेजा है। बाबा शेख फ़रीद जी भी एक ऐसी ही महान आत्मा थे, जो शांति का पैगाम बांटने इस दुनिया पर आये। इसलिए श्री जगमोहन सिंह बराड़ ने फरीद जी को ‘‘प्रेम और एकता की रोशनी’’ कहा है।

जिस काल (युग) में वह उन्होंने विचरण किया समय भी सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक हालात अधिक अच्छे नहीं थे। शेख फरीद जी ने बारहवीं शताब्दी में विचरण किया जब मौलवी और काजि़यों का बोलबाला और कट्टरपंथियों का जोर-जुल्म चलता था। हिन्दुस्तान में मुसलमानों का राज्य अभी स्थापित ही हुआ था। मुसलमानों में अपने मज़हब की शाखाओं को फैलाने की भूख थी। वह अपने धर्म को दूसरे धर्मों की तुलना में सर्वोत्तम समझते थे। वह चहते थे कि सारे संत-फकीर अपने प्रचार के द्वारा इस्लाम को सर्व-श्रेष्ठ धर्म सिद्ध करें ताकि हिन्दुस्तान में बाकी धर्म लुप्त हो जाये। जो मौलवी (फकीर) मानवीय एकता और सांझीदारी की बात करते थे। वे इस्लामी अधिकारियांे से नफरत पाते थे और उनको सख्त सज़ा दी जाती थी।
बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी में केवल हिन्दु और मुसलमानों के बीच में ही टकराव नहीं था। बल्कि तुर्कों ने भी उत्तरी भारत में कहर मचाया हुआ था। मुसलमानों में तुर्की मुसलमान और गैर-तुर्की मुसलमानों में बहुत मतभेद थे। तुर्की हुक्मरानों को यह हरगिज़ गवारा नहीं था कि कश्मीर के मुसलमान बुद्ध के प्रति श्रद्धा की भावना रखें, पश्चिमी भारत में मुसलमान हिन्दु देवताओं का आदर करें और बंगाल में मुसलमान शीतला माता की उपासना करें। भारत में कट्टर मुस्लिम सत्ता को शिया मुसलमानों से बहुत विरोधाभास मिला। क्योंकि शिया मुसलमानों की शिक्षा में प्यार और भाईचारे का संदेश था। इस तरह सुन्नी और शिया मुसलमान धड़ों के आपस में सींग फंसे हुए थे। जिस से सामाजिक माहौल प्रदूषित हुआ था।
सांस्कृतिक और सामाजिक कुरीतियों और असंगत्ति के साथ भरपूर बारवहीं-तेरहवीं शताब्दी का वर्णन करते हुए पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अपनी पुस्तक श्ळसपउचमे व िॅवतसक भ्पेजवतल - क्पेबवअमतल व िप्दकपं में भी इसका संकेत करते हुए लिखा है कि उस समय भारत में बाहरले हमलों के कारण अफरा-तफरी (भागा-दोड़ी) फैली हुई थी। अफ़गानी मुसलमान प्दकव ।तलंद होने के कारण अनेकों मतभेद पैदा हो गये थे। चारों तरफ हाहाकार मची हुई थी।
इसके इलावा उस समय के सामाजिक और राजकीय ढांचे में बेशुमार बिगाड़ थे। लोग अज्ञानता के अंधेरे कुएं में गिरे हुए थे। जोगियों और नाथों ने खलकत को अपने माया जाल में जकड़ कर रखा हुआ था।
संस्कृति की एक पंक्ति है कि ‘परोपकार्य सत्य विभूत्य’ अर्थात कि सज्जन पुरूषों द्वारा किया सृजन परोपकार के लिए होता है। लोगों के जीवन स्तर को ऊँचा उठाने और मनुष्य के अंदर मानवता को जागृत करने के लिए उस समय की नज़ाकत को समझते हुए फरीद जी ने अलग मत पैदा करने से बेहतर यह समझा कि प्रचलित मतों में से ही अच्छाई को उभार कर सामने लाया जाये। इसी कारण उन्होंने सूफ़ीवाद के सिद्धांतों के ऊपर जीवन भर पहरा दिया और उसी का ही प्रचार किया। बारहवीं शताब्दी में जब चंगेज खान ने गज़नी पर धावा बोल दिया तो शेख फरीद जी के परदादा और कई और नज़दीकी बुजुर्ग जंग में ही शहीदी प्राप्त कर गये। इस के उपरांत फरीद जी के दादा काज़ी सुयैब (साइब) का गज़नी में रहना खतरे से खाली न रहा और वह परिवार सहित काबुल जा बसे। परन्तु काबुल में भी हालात बहुत संतोषजनक नहीं थे। मजबूरन बारहवीं शताब्दी के मध्य (1150-51) में उन्हें अपने तीनों पुत्रों सहित काबुल से उजड़ कर लाहौर, सैयद अली हज़ीरवी, दाता गंज बख्ज के द्वार पर आना पड़ा। वहां से सुयैब, कसूर चले गये और कसूर के नवाब ने सुयैब को कोतवाल बना दिया। 
कसूर में ही सुयैब ने अपने बेटे जमालद्दीन सुलेमान (ज़मालूद्दीन) की शादी कुरसूम (मरियम) नाम की एक धार्मिक ख्यालों वाली स्त्री के साथ कर दी। पर कसूर में भी सुयैब ज्यादा देर न टिक सके और मुल्तान के नजदीक पाकिस्तान वाले पंजाब के एक गांव खोतेवाल (कई लेखकों ने अपनी रचनाओं में इस गांव का नाम खेलवाल, खोतवाल, खोटवाल, खत्तवाल, खोतीवाल आदि लिख दिये हैं। लेकिन इसका वास्तविक नाम खोतेवाले ही माना जा सकता है क्योंकि अब खोतेवाल से बिगड़कर इसका नया नाम कोठेवाल पड़ गया है। इस जगह फरीद जी के पिता और चाचा मुअजु़द्दीन की कब्रें भी एक पुरानी मस्जिद में मौजूद हैं।) में जाकर डेरा लगा लिया। फिर बाद में किसी मुसलमान बादशाह ने उनको खोतेवाल का काज़ी घोषित कर दिया था।
यहां रहते ही जमाल उद्द-उद्दीन के घर, बीवी कुरसूम की कोख से तीन पुत्रों इजुद्दीन महमूद फरीदुद्दीन मसयुद (शेख फरीद जी), नजीबुद्दीन और एक लड़की ने जन्म लिया।
बाबा शेख फरीद जी का जन्म प्रसिद्ध इतिहासकार हैनरी जोर्जकीन, थोमस, विलियम और डा. बीऐल की खोजों के मुताबिक 1173 (हिजरी 569) को और देहांत 17 अक्तूबर 1265 को 92 साल की आयु में मुर्हरम की 5 तारीख मंगलवार 664 को हुआ था। परन्तु पाकपटन फरीद जी की कब्र के ऊपर वलादत (जन्म सन्) 569 हिजरी और वसाल (देहांत) 5 मुहर्रम 664 हिजरी लिखा हुआ है। खोजकार मोहम्मद आसिफ खान के अनुसार फरीद जी का जन्म 584 हिजरी (1188 ई.) और मौत 5 मुहरर्म 67 हिजरी (7 मई 1280 ई.) बताया गया है। इसके इलावा बहुत सारी पुरानी ऐतिहासिक किताबों में से मौत के सन् की भिन्नता होने के बावजूद भी एक बात जो हर जगह एक समान मिलती है। वह यह है कि फरीद जी की मौत का काला दिन मंगलवार था और उस दिन इस्लामी साल हिजरी के पहले महीने मुहर्रम की 5 तारीख थी। एक विद्वान के अनुसार बतायी जाने वाली देहांत की तारीखों में 5 मुहर्रम को मंगलवार का दिन सिर्फ 7 मई 1280 ई. को ही आया था। इसलिए यह तारीख ही सबसे अधिक उचित और प्रमाणिक है। इस लेख को लिखने के लिए जिन अठारह किताबों के अध्ययन कार्यों में से मैं गुजरा हूँ, उनमें से अधिकतर ने इन्हीं दिनाकों की ही पुष्टि की है।
चाहे फरीद जी के दादा जी ज्ञानी पुरूष थे, पिता परमात्मा का नाम जपने वाले व्यक्ति थे पर फिर भी फरीद जी की शख्सीयत पर अधिक प्रभाव उनकी माता जी का पड़ा। उनकी शिक्षाओं का परिणाम स्वरूप फरीद जी के मन में त्याग और प्रार्थना के भावों ने घर कर लिया। माँ द्वारा दिखाये मार्ग पर चलते हुये फरीद जी पड़ाव-दर-पड़ाव अपने हृदय में धार्मिकता और सदाचार के श्रेष्ठ गुण धारण करते चले गये। फरीद जी की शख्सीयत को निखारने के लिए उनकी माता जी के योगदान को देखकर ही उनको संसार के बीच के अढ़ाई माताओं में से एक होने का दर्जा दिया गया है। (एक कथन है कि दुनिया में कुल अढ़ाई माताएँ ही हैं। एक फरीद की, दूसरी धुव्र भगत की और आधी गोपी चंद की। क्योंकि गोपी चांद की मां बेटे को प्रभु की तरफ लगा कर, पीछे से वियोग में विलाप करने लग पड़ी थी।) फरीद जी को उनकी माता जी लोरी भी कुरान की आयते (पंक्तियां) पढ़ कर देते थे। वे रोज फरीद जी को हदीसा की कथाएं सुनाया करती थी। नमाज़ में फरीद जी का दिल लगवाने के लिए हर रोज चटाई के नीचे शक्कर रख देती थी। कहते है कि एक दिन नमाज के समय मां शक्कर रखना भूल गई। पर जब आदत के अनुसार चटाई के नीचे हाथ मार कर शक्कर की जगह फरीद जी ने मिट्टी मुँह में पाई तो उनको वो भी मीठी-मीठी लगी और पता ही ना चला कि वह शक्कर खा रहे हैं या मिट्टी। फरीद जी प्रभु भक्ति में इस कदर लीन हो चुके थे कि उनको नाम के रस के सिवाये ओर सारे दुनियावी स्वाद भूल गये थे। इसके साथ फरीद की वाणी में मिठास और स्वभाव में मधुरता आई जिस के कारण उनको गंज-ए-शकर अर्थात् ‘मीठे का भंडारा भी कहा जाने लगा। इस घटना को स्मरण करके बाद में फरीद जी ने उच्चारण किया था।
फरीद सकर खंडु निवात गुड़ माखियो मांझा 
सबे वस्तु मिलीया रब न पुजनि तुदु।।
अर्थ: फरीद जी कहते हैं कि चाहे शक्कर, चीनी, मिसरी, गुड़, शहद और दूध आदि यह सारे पदार्थ मीठे हैं, परन्तु इनकी मिठास अस्थाई और कुछ समय के लिए है। सिर्फ परमात्मा का नाम ही स्थायी रूप में मीठा और मधुर है। सो हमें उसकी तलाश करनी चाहिए।
फरीद जी को पांच साल की आयु में विद्या प्राप्त करने के लिए भेजा गया। आप ने ग्यारह साल की आयु में सारा कुरान स्मरण कर लिया था। इसी वर्ष फरीद जी को माता जी के साथ मक्का हज़ करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। फरीद जी को अठारह वर्ष की अवस्था में और तालीम (शिक्षा) दिलवाने के लिए धार्मिक विद्या के प्रसिद्ध केन्द्र मुलतान भेज दिया गया। उस समय मुल्तान फकीरों और आल्मों-फाजलों की रिहाइशगाह के तौर पर मशहूर था, जिसका वर्णन फारसी के एक बड़े मशहूर शेयर में ही मिलता हैंः-
चार चीज़ अस्त तुहाफाये मुल्तान
गर्द, गर्मा, गदाव, गोर सतान।।
(अर्थात मुल्तान की चार चीजों प्रसिद्ध है। हर समय उड़ने वाली धूल, यहां की सख्त गर्मी दरवेश और यहाँ के मजार)
फरीद जी ने यहां चार साल रहकर विद्या ग्रहण की और अपने ज्ञान में वृद्धि की। यहीं पर फरीद जी ने प्रसिद्ध सूफी फकीर जलाल-उद्द-द्दीन तबरेज़ी (मौलाना रूमी) की काफी देर संगत की। फरीद जी के ऊपर उनका बहुत प्रभाव पड़ा और उन्होंने तबरेजी से बहुत कुछ सीखा। उस के पश्चात् चिश्ती सिलसले वाले ख्वाज़ा कुतुब-उद्द-द्दीन बखतियार काकी (देहांत 27 नवम्बर, 1235) मुल्तान आये। इतफ़ाकन वह उसी मस्जि़द में नमाज़ पढ़ने चले गये जहां पर फरीद जी शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। उन्होंने फरीद जी को बंदगी में डूबे देख कर बड़े प्यार से पूछा, ‘‘क्या पढ़ रहे हो?’’
फरीद जी ने सिर झुकाये ही कहा, ‘‘अल नाफअ’’। जब फरीद जी ने सिर उठाकर ख्वाज़ा की ओर देखा तो देखते ही रह गये। क्योंकि फरीद जी ने उनकी काफी महिमा सुनी हुई थी और वे उनकी शख्सीयत से बहुत पहले से ही मुतासिर थे। ख्वाजा ने फरीद जी को बताया कि जो धार्मिक पुस्तक वह पढ़ रहे हैं उसके साथ उनको कोई फायदा नहीं होगा। फरीद जी ने उनसे अपने मार्ग दर्शन के लिए सलाह मांगी। बख्तियार काकी ने उनके योग्य अगवाई की और सलाह देते हुये कहा, ‘‘कुछ दिन और इलम (शिक्षा) हासिल कर ले, बाबा फिर दिल्ली आ जाना।’’
कुतुब-उद-द्दीन के बाबा कहकर संबोधन करने के कारण फरीद जी के नाम के साथ हमेशां के लिए ‘बाबा’ शब्द जुड़ गया। फरीद जी काकी के साथ का अधिक से अधिक फायदा लेना चाहते थे। इसलिए उन्होंने जितने दिन भी मुल्तान मंे काम किया फरीद जी उनके अंग संग रहे। फरीद जी की जल्दबाजी देख कर ख्वाजा साहिब ने उनको समझाया, ‘‘बाबा! धैर्य रख। अल्लाह रूपी मंजिल पर धैर्य के राह पर चल कर ही पहुँचा जा सकता है।’’
फरीद जी ने अपने मुर्शद के उपदेश को पल्ले बांध कर उसके ऊपर न सिर्फ कार्य ही किया। बल्कि फिर आगे जाकर अपने श्लोक में कहाः-
अर्थ: फरीद जी लिखते हैं कि सब्र (धैर्य) एक ऐसा हथियार है जिसका निशाना कभी भी नहीं चूकता। धैर्य के तीर को ईश्वर भी कभी व्यर्थ नहीं जाने देता।
फरीद जी कुछ समय उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए कंधार गये। कंधार से वापिस आकर थोड़ा समय मुल्तान में ही रहे। मुल्तान से ख्वाजा जी के पास दिल्ली चले गये। यहाँ उनकी गिनती के चुनिंदा सूफी चेलों में होती था। ख्वाजा जी की छत्र-छाया के तले वह अधिक समय जप-तप में लीन रह कर गुजारते। यहाँ फरीद जी की कठिन साधना का ख्वाज़ा मुअईनुदीन के ऊपर विशेष प्रभाव पड़ा और उन्होंने फरीद जी के उज्जवल भविष्य के बारे भविष्यवाणी भी की। जिसके फौरन बाद फरीद जी ने एक चिला-ए-माकूस (जिस में चालीस दिन शारीरिक कष्ट झेल कर कठिन तपस्या की जाती है) भी सम्पूर्ण किया।
दिल्ली में रहते फरीद जी की चर्चा दूर-दूर तक होने लग पड़ी थी। श्रद्धालु और जिज्ञासु सदा उनके दर्शनों के लिए उतावले रहने लगे। फरीद जी द्वारा संगतों के साथ बहुत समय बिताने के कारण तपस्या और बन्दगी में रूकावट पड़नी शुरू हो गई। इस लिए फरीद जी काकी की आज्ञा लेकर दिल्ली छोड़ हांसी (जिला हिसार) चले गये।
दिल्ली से हांसी जाते समय रास्ते में फरीद जी ने थक कर मोकलहर शहर में आराम करने के लिए पड़ाव किया। उस समय वहाँ का राजा मोकलहर राय (गोकल देव) अपना महल बनवा रहा था। राजा के हाकिम प्रजा और उस नगर में आने-जाने वाले प्रत्येक व्यक्ति से जबरदस्ती मजदूरी करवाते थे। फरीद जी को भी उन्होंने जबरदस्ती काम करने लगा दिया। फरीद जी ने अपने अमूल्य वचनों के साथ राजा के साथ को उसकी भूल का एहसास करवाया और राजा ने फरीद जी से माफी मांगी।
फरीद जी हांसी में ही थे कि उनको ख्वाजा की नाजुक हालत का संदेश मिला। फरीद जी ने जल्दी से दिल्ली की तरफ यात्रा आरंभ कर दी। पर बदकिस्मती से वह उस समय न पहुँच सके और ख्वाजा जी के उनके आक्रमण से पांच दिन पहले अकाल चलाना कर गये थे।
फरीद जी की गैर हाज़री में कुतुबद्दीन ने काज़ी हमीद्दूद्दीन नागौरी को गोदड़ी, मुस्सला, आसा और दस्तार आदि देकर हिदायत दी कि इन वस्तुओं के ऊपर फरीद जी का हक है और वह उनको सौंप दे। इसका अर्थ यह था कि उनके बाद फरीद जी गद्दी के जान-नशीन (हकदार) होंगे। फरीद जी ने दिल्ली आकर अपनी अमानतें तो ले ली, पर उत्तराधिकारी के रूप में चिश्ती सिलसिले की बागडोर संभालने की बजाय शेख बदरूद्दीन को जिम्मेवारी संभाल दी और खुद अजोधन (अकबर बादशाह ने अपने राज्यकाल के समय अजोधन का नाम बदलकर पाकपटन रख दिया था। आसा की वार की नौ पंक्तियों का गुरू नानक देव जी ने पाकपटन बाबा फरीद के स्थान पर ही उच्चारण किया था। पहली 15 का दूनी चंद की डयोढ़ी (बैठक), लाहौर, दुनी चंद का गुमान उतारने के लिए उच्चारण किया था) जो चले गये। फिर फरीद जी 1236 ई. से लेकर अपने अंतिम समय तक यहाँ ही रहे।
फरीद जी ने अजोधन में खानगाह और सराय का निर्माण करवाने से इलावा सौ फुट ऊँचे टिब्बे के ऊपर अपना जमाइतखाना भी बनवाया हुआ था। यह एक बड़ा बुलंद कोठा था जो मुसाफिरों के ठहरने के लिए बनाया गया था। इसके दरवाजे आधी रात तक यात्रियों के लिए खुले रहते थे। जमाइतखाने में बड़ी दूर-दूर से संत, फकीर, तालिब, आलम, अदीब और जिज्ञासु आया करते थे। इस स्थान पर धार्मिक बहस मुबाइसे निरन्तर चलते रहा करते थे, जिनमें नाथ जोगी भी भाग लेते। ये लोग कई बार आवेश में आ जाया करते थे। पर फरीद जी नम्रता और मीठा बोलने का उपदेश देकर उनको शांत करने का प्रयास किया करते थे। उनके रूखे व्यवहार के प्रतिक्रम के तौर पर अपनी वाणी में फरीद जी ने उच्चारण (फरमाया) किया था।
फरीदा साहिब दी करि चाकरी दिल दी लाहि भरांदि।।
दरवेसां नो लोड़ीये रूखां दी जीरांदि।।
अर्थ: परमात्मा की सेवा करो। यह कर्म आत्मा पर पड़े सारे भम्रों-संश्यों को उतारने में समर्थ है। दरवेश का हृदय वृक्ष की भांति विशाल और महान होना चाहिए। वे छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा नहीं करते।
अजोधन में रहते कई बार फरीद जी को स्थानीय अधिकारियों की गुस्ताखी का सामना भी करना पड़ा था। एक मौके पर अयोधन के काज़ी ने मुल्तान के उल्मों को शेख फरीद के विरुद्ध फतवा जारी करने की विनती भी की थी। उन्होंने दोष लगाया था कि दरवेश फरीद मस्जिद में रहता है और संगीत की महफिलों में शरीक होता है। चाहे उल्मों ने काजी की बात न मानी पर तो भी फरीद जी के विरुद्ध दरबारी दमन और दबाव पड़ता रहा। फरीद का कलाम और शिक्षाए  उस समय की सरकार को ना-पसंद थे। इस कारण एक-दो बार तो फरीद जी पर जानलेवा हमले भी हुए थे। दूसरे फकीर फरीद जी की वाणी को अपनी आलोचना के औजार के साथ काटने का यत्न भी किया करते थे। लेकिन फरीद जी उनकी निंदा और नुक्सों की बिल्कुल परवाह न करते और हंस कर उनको कहते,
फरीदा जे तू अक्ल लतीफु काले लिखु न लेख।।
आपनड़े गिरीवान महि सिरु नीवां करि देखु।।
अर्थः हे इन्सान! यदि तू बुद्धिमान है तो बुरे कर्म न कर। किसी ओर की आलोचना करने से पहले अपने मन के अंदर निगाह मार कर देख। क्या तेरे अंदर तो वह कमजोरियां नहीं है।
फरीद जी पूरी उम्र घास फूस से बने एक छप्पर में निवास करते रहे क्योंकि चिश्ती सम्प्रदाय के अनुसार ईटों की बनी इमारत में रहना एक सूफी के लिए वर्जित था।
फरीदा कोठे मंडप माडि़या ऐतू न लाये चित्तु
मिट्टी पई अतोलवी कोई न होसी मित्तु।।
खुआजा कुतुबद्दीन की ओर से प्राप्त हुये सोटे का फरीद जी सिरहाने (तकीये) के रूप में प्रयोग करते थे। फरीद जी के पास छोटा सा काला कम्बल था। जिस के विषय अपने श्लोकों में वह खुद संकेत देते हुए लिखतें हैंः-
फरीदा गलीये चिकड़ु दूरि घरु नालि प्यारे नेहु
चला त भिजै कंबली रहा ते तुटै नेहु।।
अर्थ: फरीद जी लिखते हैं कि गलियों में कीचड़ है और पति (परमात्मा) का घर बड़ी दूर है। मेरा उसके साथ मिलने का इकरार किया हुआ है। यदि जाता हूँ तो मेरा इकलौता कम्बल भीगता है, यदि नहीं जाता तो इकरार से झूठा पड़ता हूँ और प्रेम टूटता है।
इस कम्बल को फरीद जी रात को ओढ़ने के तौर पर ऊपर ले लेते थे। दिन के समय इसी के ऊपर बैठ कर वह ईश्वर के स्मरण में लीन रहते थे। सर्दियों में छोटे कम्बल के साथ सिर को ढकते समय उनके पैर नंगे हो जाते थे और पैरों को छिपाते हुए सिर नंगा हो जाता था। परन्तु फरीद जी परेशान होने की बजाय ईश्वर का शुक्रिया अदा करते हुए कहते थे कि यदि कम्बल बड़ा होता तो मैंने अब तक सोये हुए होना था। अच्छा हुआ ठंड से मेरी नींद खुल गई और ईश्वर का नाम जपने (ईश्वर के नाम का जाप) का मौका मिल गया है।
फरीदा पिछल रात न जागियोही जीवदड़ो मुइओही
जे ते रब विसारिया ते रब न विसरिओही।।
अर्थः हे इन्सान! यदि तू रात के आखरी पहर (सुबह का पहला पहर) उठकर प्रभु की भक्तिनहीं करता तो तू जीवित होता हुआ भी मरे हुए के समान है। चाहे तूने तो भगवान् को छोड़ दिया है पर भगवान ने तुझे नहीं छोड़ा है। वह हमेशा तेरे और तेरे कर्मों का ख्याल करता है। कंजमूल, पीलू, करीर के डेले, जौं की खुश्क रोटी या कुछ और जंगली फूल ही फरीद जी की खुराक थी, जो वह खुश होकर खा लिया करते थे।
रूखी सूखी खाय के ठंडा पानी पी।।
फरीदा देखी पराई चोपड़ी न तरसाये जी।।
अर्थः फरीद जी का फरमान है कि रूखी-सुखी खाकर, शीतल जल पीकर जिन्दगी व्यतीत कर लेनी चाहिए क्योंकि धैर्य व्यक्ति को एक अंदरूनी ताकत देता है। दूसरे लोगों की चुपड़ी हुई रोटी को देख कर ईर्ष्या या लालच नहीं करना चाहिए क्योंकि यह भाव मन को माया के मार्ग कीओर ले जाते हैं। माया और परमात्मा का परस्पर विरोध है।
फरीद सत्य परमात्मा की प्राप्ति के लिए ज्ञान के मार्ग को प्राथमिकता देते थे।
फरीद सत्य नम्रता, क्षमा, अच्छा आचरण, मीठा बोलना, दुख-सुख की संभावना और शांतिवाद के ग्रहण और गुस्से, स्वयं अभिमान, लालच, कुकर्म के त्याग और अहम् को मानने के ऊपर ज़ोर दिया करते थे।
फरीदा काले मैडे कपड़े काला मैडा वेसु।।
गुननी भरिया मैं फिरा लोक कहै दरवेसु।।
एक बार फरीद जी तरबूजों के किसी बाग के पास से गुजर रहे थे। रास्ते में एक अध-खाये हुए तरबूज़ को छिलके पड़े थे। कोई मुसाफिर उसके ऊपर से फिसल कर गिर न जाये, इसी ख्याल के साथ फरीद जी ने उसको उठाकर दूर फेंक दिया। बाग के मालिक ने उनके हाथों में तरबूज का टुकड़ा देख लिया उसने समझा कि कोई तरबूज चोरी करके खा रहा है। मालिक ने आते ही फरीद जी को अच्छा भला-बुरा बोलना और दुर-व्यवहार करना शुरू कर दिया। पर फरीद जी बिल्कुल चुप रहे।
फरीदा जो तै मारनि मुकिया तिना न मारे घुम
अपनड़े घर जाइये पैर तिना दे चुम।।
अर्थः हे फरीद! यदि तुझे कोई दुख देता है तो तू भी जवाब में उसको दुखी करने की कोशिश न कर, बल्कि तेरे लिए उचित यही होगा कि तू ऐसे बुरे आदमी के घर जाकर नम्रता सहित उससे क्षमा मांगे।
बाग के मालिक का गुस्सा ठंडा हुआ और वह अपनी गलती के ऊपर पछताया। उसने फरीद जी के पास से हकीकत को जानने के बाद शर्मिंदा होकर माफी भी मांगी। फरीद जी ने उस समय उपदेश देते कहा,
फरीदा बुरे दा भला कर गुस्सा मन न हंडाई।।
देह रोगु न लगई पलै सबु किछु पाई।।
अर्थ: फरीद जी कहते हैं कि बुरे व्यक्ति का भी भला करो और उसके प्रति अपने मन में कभी भी गुस्से के भाव पैदा न होने दो। इस तरह करते समय आपका तन और मन रोगों से मुक्त रहेगा और आपको सारी खुशियां भी प्राप्त हो जायेंगी।
बड़े दूर-क्षेत्र से अजोधन में कोई मुसाफिर आया। उसने अजोधन वासियों से पहुंचे हुए फकीर का पता पूछा। अजोधन वासी ने उस व्यक्ति को फरीद जी की झोपड़ी के आगे ले जाकर खड़ा कर दिया और कहा कि यह ही आपकी मंजिल है। वह व्यक्ति कच्ची झोपड़ी की ओर हैरानी से देखने लगा। वह शख्स अजोधन वासी पर यकीन करके मजबूरन अंदर चला गया और जाते ही उल्टे-पाँव पीछे मुड़ आया। बाहर आते ही कहने लगा, ‘‘आपने मेरे साथ अच्छा मजाक किया है। यदि आपको नहीं पता था तो जवाब दे देते। मैं किसी ओर से पूछ लेता। मुझे इस गरीब की झोपड़ी में क्यों भेज दिया। मैंने तो आप से वली अल्लाह जो कि इस समय बाईयां कुतर्बों में से चोटी का पीर है; उससे मिलवाने के लिए कहा था।
अजोधन वासी हंस पड़ा, वह जान गया था कि इस श्रद्धालु के मन में भी यह भम्र है कि शेख फरीद रेश्मी लिबास पहने, सोने को हाथ में लिये, सिर पर शानदान दस्तार (पगड़ी) सजाये, किसी बड़े महल में रहता होगा। उस वासी ने मुसाफिर को कहा, आपका कोई दोष नहीं। किसी अनजान व्यक्ति के लिए फरीद जी गरीबी का जीवन व्यतीत करते हैं। बाजरे की खुश्क रोटियों के साथ ही पेट की भूख को मिटा लेते हैं।
फरीदा रोटी मेरी काठ दी लावण मेरी भूख।।
जिहना खादी चोपड़ी घणे सहनगे दुख।।
अर्थः फरीद जी कहते हैं कि मेरी रोटी चाहे काठ की बनी हुई है, परन्तु यह मेरी भूख को शांत कर सकती है। जो इंसान चुपड़ी रोटी की खाहिश करते हैं,उनकी भूख बल्कि और बढ़ती है, नीयत खराब हो जाती है और अंत में ऐसी नीयत वालों को बहुत दुख सहने पड़ते हैं।
चाहे फरीद जी को लोग अनेकों वस्तुएं भेंट करते थे। पर वह सब जरूरतमंदों में बाँट दिया करते थे। यह सब सुन कर उस अजनबी के हृदय में शेख फरीद जी के लिए श्रद्धा और बढ़ गई।
एक ओर साखी के मुताबिक एक बार किसी श्रद्धालु ने फरीद जी को एक सोने की कैंची भेंट करनी चाही तो उन्होंने फरमाया कि मुझे कैंची की नहीं, लोहे की सूई की जरूरत है। कैंची हमेशा काटती है जब कि सूई जोड़ने का काम करती है। इसलिए मैं चाहता हूँ कि मुझ से कुछ टूटे न हमेशा कुछ न कुछ जोड़ता ही रहूं।
सूफीवाद का प्रचार करते समय बहुत सारे लोग फरीद जी से प्रभावित होकर उनके शिष्य बन गये थे। उस समय के प्रसिद्ध कबीले जैसे सियाल, सरहंगवाल, बहिलो, झखड़वाल, बहक, हॅक सिया, खोखर, ढड्डे और टोबे आदि जो झंग और शाहकोट जिलों में आज भी फैले हुए हैं फरीद जी को विशेष आदर सम्मान दिया करते थे। सूफीवाद के प्रसार के लिए फरीद जी के पाये योगदान का जिक्र करते हुए हिमिलटन गिब लिखते हैं कि ’’ैीमपाी थ्ंतपक पे ं ेमउपदक चमतेवदंसपजल पद जीम कमअमसवचउमदज व िप्ेसंउपब डलेजपबंस उवअमउमदज पद प्दकपं’’
अजोधन ही फरीद जी की आयु पच्चीस साल की हो गई थी यही से वह शेख शहाब-उद्द-द्दीन सुहरवादी (जन्म, जनवरी, 1145 और देहांत सितम्बर 26, 1234) के पास जाने की इच्छा के साथ बगदाद जाते समय रास्ते में बुखारा में एक पहुँचे हुये फकीर अजब शेराज़ी के पास चले गये। शेराजी ने फरीद जी को देखते ही नेक आदमी, नेक आदमी का नारा लगाना शुरू कर दिया।
कुछ दिन फरीद जी ने शेराजी की संगति की। वे अज़ल शेराजी के उपदेशों से काफी प्रभावित हुए। वे कहा करते थे कि फकीर को मोह माया का त्याग और दौलत से परहेज करना चाहिए।
फरीद जी को बगदाद में ही हज़रत किरमानी के दर्शन भी हुए थे। फरीद जी उनके साथ सीसतान भी गये। बगदाद में फरीद जी को सुहरावर्दी, जलाल-उद्द-द्दीन तबरेज़ी वही-उद-दीन जैसे मुर्शदों की संगति प्राप्त हुई थी। यहीं पर फरीद जी ने अवार्फ-ऊ-मारफ (जिसको हकीक भी कहते हैं) नाम की पुस्तक का अध्ययन भी किया।
काकी जी की ओर से फरीद जी के साथ शादी का जिक्र छेड़े जाने पर फरीद जी अक्सर खामोश हो जाया करते थे। पर एक बार काकी जी ने फरीद जी को विवाह के संदर्भ में प्रश्न कर ही लिया तो फरीद जी कहने लगे, ‘‘खौफजदा (डरता) हूं कि यदि औलाद अल्लाह का नाम स्मरण करने वाली न हुई तो खुदा के पास कौन सा मुँह लेकर जाऊँगा?’’
यह सुनकर ख्वाजा साहिब ने फरीद जी को समझाया-बुझाया और निकाह के लिए यह कहकर राज़ी किया कि अगर नेक औलाद हुई तो आपकी, जो बुरी हुई तो उसको या अल्लाह जाने या हम समझे। उसके कुछ समय फरीद जी की शादी अलग खान सिपाह-सलार की लड़की के साथ हुई। बाद में अलग खान ही बादशाह बलबन बना और प्रसिद्ध हुआ।
फरीद के पांच पुत्र और तीन बेटियाँ थी। सब से बड़ा बेटा नसीरूद्दीन ईश्वर का भक्त था, जो अधिकतर समय पूजा-पाठ करने में व्यतीत करता, परन्तु उपजीविका कमाने के लिए वह कृषि (खेतीबाड़ी) का काम करता था। नसीरूद्दीन का बेटा शेख कमाल-उद्द-द्दीन भी एक बड़ा प्रसिद्ध फकीर बन गया था। दूसरा बेटा शहाबुद्दीन, शेख निजामुद्दीन औलीया का बड़ा करीबी साथी रहा था। तीसरा बदरूद्दीन सुलेमान चिश्ती खलीफे के तौर पर मशहूर हुआ। उसका बेटा शेख अलाउद्दीन भी सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के जमाने में एक बड़ा सूफी फकीर बन चुका था। उसकी शोहरत सीरीया और मिसर तक पहुँच गई थी। सुल्तान महसूद बिन तुगलक उसका शिष्य था।  फरीद जी की तरह ही शेख अलाउद्दीन ने भी अपनी सारी जिन्दगी भगवान् की बंदगी में व्यतीत की। फरीद जी अपने चौथे पुत्र निजामुद्दीन को बहुत प्यार करते थे। परन्तु उसने फकीर बनने की बजाये सिपाही का जीवन जीने को तरजीह की और बलबन की फौज में भर्ती हो गया। जब मुगलों ने अजोधन के ऊपर हमला किया तो अपने वतन की रक्षा के लिए लड़ता हुआ शहीद हो गया। पांचवा पुत्र शेख याकूब एक मामूली सूफ़ी फकीर था और उसके जीवन के बारे में कोई ज्यादा विवरण नहीं मिलता। फरीद जी की बेटियों मेंसे बीबी शरीफा सब से बड़ी थी। वह जवानी में ही विधवा हो गई थी। उसने दुबारा शादी नहीं करवाई, अपनी जिन्दगी रब की इबादत में गुज़ार दी। फरीद जी की इच्छा थी कि यदि स्त्रियों को खलीफा बनने का हक होता तो वह बीबी सरीफा को अपना खलीफा जरूर बनाते। फरीद जी की दूसरी बेटी के बारे में कोई खास जानकारी उपलब्ध नहीं है। तीसरी बेटी की मुरीद बदरूद्दीन इसहाक के साथ शादी हुई थी।
शेख जिया-उद्द-द्दीन जब फरीद जी को मिलने आये तो वह बहुत घुटन में बैठे थे। उनको डर था कि कहीं फरीद जी अपनी विद्वता का प्रदर्शन करते हुए उनका मजाक ही न उड़ाने लग जाये। लेकिन फरीद जी ने वैसा कुछ न किया और शेख साहिब का दिल जीत लिया।
एक बार किसी शिष्य ने फरीद जी से सुल्तान बलबन कीओर सिफ़ारशी चिट्ठी मांगी तो आप ने बलबन को लिखा, ‘‘यदि इसका काम कर दोगे तो असल में काम अल्लाह की ओर से ही होगा और धन्यावाद के पात्र आप होंगे। यदि काम न किया रूकावट भी अल्लाह की ओर से होगी और आप असमर्थ समझे जाओगे।’’
एक दफा फरीद जी के मन में विचार आया कि चार प्राथमिक सवालों का जवाब अलग-अलग सौ दरवेशों के पास पूछा जाये ताकि लोगों का राह आसान हो। वे हैरान हुए कि हर दरवेश ने एक सा जवाब दिया। वह चार प्रश्न निम्न लिखित थेः-
पहला: सब से अक्लमंद कौन है?
उत्तर: त्यागी
दूसरा: सब से बड़ा कौन है?
जवाब: जो दुख-सुख को समान करके जानता है।
तीसरा: सब से अमीर कौन है?
जवाब: संतोषी (संतुष्ट)
चौथा: गरीब कौन है?
जवाब: अधिक इच्छाएं रखने वाला
फरीद जी ने अपने जीवन काल में बहुत सारी जगहों पर घूम-फिर कर वाणी का प्रचार किया। वे हिन्दुस्तान में दिल्ली, अजमेर शरीफ, रजबपुर, बंदायूँ, हांसी, फरीदकोट, लाहौर, दीपालपुर और चक दीवा सहित बहुत सारे शहरों में गये। इस के अतिरिक्त विदेशों में आप ने मक्का, मदीना, बगदाद, बखारा, शीसतान, बदखशा, करमान, कंधार और गजनी आदि शहरों का चक्कर भी लगाया।
फरीद जी अरबी, फारसी, उर्दू, हिन्दी और पंजाबी आदि भाषाओं का ज्ञान रखते थे। वे अपने भगवान् की बंदगी और संदेश पत्रों के लिए पंजाबी ही इस्तेमाल किया करते थे। बहाऊद्दीन जिक्रिया के साथ फरीद जी का ख्याली मतभेद होने पर भी अक्सर उनका पत्र व्यवहार उनसे चलता रहता था। मोह प्यार के रिश्ते की मजबूती के लिए बहाऊद्दीन, फरीद जी को तोहफे के तौर पर मुल्तान से गाजर भेजा करते थे और उसके बदले फरीद जी बहाऊद्दीन को बेर भेजा करते थे। एक बार बहाऊद्दीन गाजर भेजनी भूल गये तो उनको याद करवाने के लिए फरीद जी ने यह शेयर लिख भेजाः
हथड़ी वट्टो हथड़े, पैरों वट्टो पैर
तुसा न मुतिया गाजरा, असां न मुत्ते बेर।
फरीद जी की वाणी में अहम् को मारने, क्षमा करने, धैर्य रखना और मीठा बोलने के ऊपर बार-बार ज़ोर दिया गया है। निंदा चुगली का तो फरीद जी सख्त विरोध करते थे। उनकी वाणी में से उनकी नम्रता की अनेकों मिसालें मिलती हैं जैसेः-
फरीदा खाक न निंदीये खाकू जेडु न कोई।।
जीवदिया पैरा तले मोया ऊपर होई।।
अर्थः फरीद जी कहते हैं कि मिट्टी को युं ही न समझो। यह बड़ी महान है और इसके जैसा ओर कोई नहीं है। आज जो मिट्टी पैरों के नीचे खराब होती प्रतीत होती है, मृत्यु के बाद यही मिट्टी हमारा कफन बनेगी।
पुराने समयों में खिलाफतनामे हुआ करते थे। यह वह दस्तावेज होते थे जिनमें उनके सारे शागिर्दों के नाम लिखे हुए थे, जिन को गुरू अपने द्वारा घोषित किये हुए खलीफे समझता था। शेख फरीद जी के खिलाफत नामों के ऊपर मौलाना बदरूद्दीन इसहाक और शेख जमालुद्दीन के दस्तख़त (हस्ताक्षर) हुआ करते थे। वैसे फरीद जी के बहुत से खलीफे थे लेकिन सीअरूल औलिया में सिर्फ सात खलीफों के बारे में विचार किया गया है।
फरीदा अख्खी देखी पतीणियाँ सुणि सुणि रीणे कन।।
साख पकंदी आया होर करेंदी वन।।
अर्थः फरीद जी फरमाते हैं कि दुनिया के नजारे देखकर आँखे कमजोर हो गई हैं, सुन कर कान बहरे हो गये हैं, जैसे खेती पकने के समय रंग बदलती है, इस तरह मौत का समय पास आने पर जीवन भी अपने रंग-ढंग बदलने लगता है।
फरीद जी अपने कथन पर सारी उम्र पहरा देते रहे थे। शरीर कमजोर होने के कारण एक बार लाठी के सहारे चल कर थोड़ा दूर गये ही थे कि लाठी दूर फेंक कर मारी और कहा, ‘‘फरीद के लिए यह नहीं जचता कि प्रभु के नाम को छोड़कर किसी बेजान लकड़ी के सहारे चले।’’
फरीदा इन्नी निक्की जंघीये थल फुंगुर भविचमि।।
अजु फरीदे कूजड़ा सै कोहां थीओमि।।
अर्थः फरीद जी कहते हैं कि इन छोटी-छोटी टांगों के सहारे मैं थल और पहाड़ों पर चला हूँ पर आज जबकि मैं बूढ़ा हो गया हूँ तो वजू करने वाला पात्र भी सौ मील की दूरी पर मालूम होता है।
अंत समय नज़दीक आकर फरीद जी ने निज़ाम-उद्द-द्दीन औलिया को खिलाफत सौंप दी और कहा, जाओ खुदा के हवाले। अब हशर में मुलाकात होगी।
देख फरीदा जु थीया दाड़ी होई भूर।
अगर नेड़ा आया पिछा रहिया दूरि।।
अर्थः फरीद जी फरमाते हैं कि देखो क्या हो रहा है। मेरी दाड़ी के बाल भूरे और सफेद होते जा रहे हैं। लगता है कि मौत का समय करीब आ रहा है और जीवन पीछे छूटता जा रहा है।
बुढ्ढा होआ शेख फरीद कंबणि लग्गी देह।।
जै सोऊ बरिया जीवणा भी तनु होसी खेह।।
जब इंसान बुढ्ढा हो जाता है तो उसका सारा शरीर कांपना शुरू हो जाता है, पर चाहें इंसान की आयु सौ वर्ष की क्यों न हो, एक दिनतो उसने मरना ही है। फरीद जी ने 5 मुहरर्म को पांच बार कुरान का पूरा पाठ किया। मगरब (शाम) की नमाज पढ़ने के बाद तनहाई की मांग की और कहा कि बुलाये बगैर कोई अंदर न आये। हुजरा बंद कर लिया। गई रात (अशा) की नमाज अदा की ही थी कि बेहोश हो गये। जब थोड़ा होश आया तो सोचने लगे कि नमाज़ पढ़ ली है या नहीं? फिर खुद ही कहने लगे कि क्या हजऱ् है? फिर पढ़ लेता हूँ। जब सजदे में हुए तो फिर सिर ऊपर न उठाया गया। उन की पवित्र रूह (आत्मा) इस बेदर्द जहान से कूच कर गई थी।
इत्त्फाक से उस समय फरीद जी के नामांकित तीनों शिष्यों में से उनके पास कोई भी नहीं था। जमाल हांसली दो साल पूर्व गुज़र गया था। साबर कलेर थे और निज़म-उद्द-द्दीन दिल्ली गये हुए थे। इसी तरह उस समय भी हुआ था जब ख्वाज़ा उस्मान हारूं गुज़रे थे। उस समय भी मीअनुदीन चिश्ती पास नहीं थे, चिश्ती के देहांत के समय बखि़्तयार काकी के पास नहीं थे और काकी की मृत्यु के समय फरीद जी हांसी थे।
फरीद जी को दफ़न करने के लिए परिवार के पास कफन का कपड़ा भी नहीं था। फरीद जी ताकीद (सिखा) कर गये थे कि किसी से मांगना नहीं। उस समय परिवार के लिए अजीब संकट पैदा हो गया था। फिर इसका हल उनकी घर की चादर को फरीद जी की लाश के ऊपर डालकर किया गया। फरीद जी की झोपड़ी की ही ईंटें उखाड़ कर ही कब्र के लिए इस्तेमाल की गई थी। उनके पश्चात् उनकी गद्दी पर उनका बेटा दीवान बदरूद्दीन सुलेमान बैठा।
फरीद जी की पंजाबी वाणी मुक्कमल तौर पर और अधिक मात्रा में दर्ज श्री गुरू गं्रथ साहिब के अतिरिक्त और किसी भी गं्रथ में से प्राप्त नहीं होती। गुरू गं्रथ साहिब में उनकी वाणी तीन जगह पर मिलती है।
1. रागु आसा में उपलब्ध 2 शब्द
2. रागु सूही में रचे 2 शब्द
3. 112 श्लोक
गुरू नानक देव जी ने फरीद वाणी पाक पटन फरीद जी की गद्दी के संचालक शेख ब्रहम् (शेख इब्राहीम) के साथ हुई गोष्ठी के समय हासिल की गई। उनकी सारी वाणी बाबा फरीद जी के 112 श्लोक और 4 शब्द अपनी किताब (गुरू साहिब प्रचार के लिए एक लिखित पुस्तक हमेशा अपने साथ रखा करते थे। पुछण खोल किताब नू वड्डा हिन्दु कि मुस्लमनोई।। बाबा आखे हाजिया, शुभ अमला बाझहु दोनों खोई।। भाई गुरदास जी ने भी ऐसे इस पुस्तक की ओर इशारा किया है।) में दर्ज कर लिये और बाद में गुरू अर्जुनदेव जी ने शेख फरीद जी की वाणी और श्लोक फरीद के, का विषय बनाकर आदर सहित उस वाणी को आदि गं्रथ साहिब में अंकित कर दिया। इस तरह फरीद जी के गुरू गं्रथ साहिब में 112 श्लोक और 4 शब्द संकलित हो गये।
सीयरूल-औलिया में फरीद जी के कथन, खत, अरबी रूबाईयां और कई फारसी बैंत मिलते हैं। पुरातन जन्म साखियों और भाई पैदे वाली बीड़ में फरीद जी के कई श्लोक हैं। पुराने पंजाबी कवालों ने फरीद जी के कई ऐसे श्लोक भी गाये हैं जो लिखती रूप में उपलब्ध नहीं थे। फरीद जी की 56 पंक्तियों की एक काफी भाषा विभाग पटियाला की लाइब्रेरी में संभाल कर रखी हुई है।
1265 ई. की लिखी एक फारसी किताब वाक्यात मुश्ताकी में बाबा फरीद पाक पटन वाले के कहे अनुसार लिख कर कुछ लिखा हुआ है। पर वह पंजाबी शब्द ठीक पढ़े नहीं जा सके जो स्पष्ट पढ़े जा सके हैं। वे ये निम्न लिखित हैंः-
चित गर जमीं न पाइये
गया बंदे कित्त
जित परदेसी।
जमाते शाही में फरीद का दोहड़ा हैः
असीं केरी यही सो रीत
जाऊं नाए कि जा मसीत।
शेख बाजण की लिखी किताब खज़ाना रहमत में फरीद के लिखे प्राप्त होते तीन पंजाबी वचनों में से एक हैः-
आवो लधो साथड़ो, ऐवे बगज कहीं
मूल संभली आपण, पाछे लाहा नई।
मध्यकालीन साहित्यऔर चिन्तन में फरीद जी का एक विशेष स्थान है। फरीद जी ठेठ पंजाबी में उच्च दर्जे की कविता लिखने वाले माननीय कवियों की कतार में खड़े हैं। फरीद को पंजाबी कविता का मूल स्त्रोत कहा जाये तो कोई अतिकथनी (गलती) नहीं होगी। कुछ हिन्दी कवियों ने भी फरीद जी को अपरंश (पुरानी हिन्दी) का कवि मानते हुए उनकी वाणी की शैलीगत विशेषता को सराहा है।
फरीद जी की काव्य रचना को रब्बी वाणी और सूफीवाद का प्रतीक माना जाता है। डालांजवंती रामाकृष्णा ने अपनी पुस्तक च्नदरंइप ैनपि च्वमजे में आपकों सूफी काव्य परम्परा का एक निर्माणकारी स्तम्भ माना है। फरीद जी ने भी दूसरे सूफीयों की तरह अपनी वाणी में अकालपुरख के सिमरन (स्मरण) के लिए प्रेरित किया है।
फरीदा चारि गवाईया हंढि के चार गंवईया समि।।
लेखा रब मंगेसिया तू आहों केरे कमि।।
अर्थः फरीद जी फरमाते है कि व्यक्ति जीवन के चार पहर (आधी उम्र) दुनियावीं काम धन्धों में गंवा छोड़ता है और बाकी के चार पहर सोकर गंवा बैठता है। जब जिन्दगी खत्म होने के बाद परमात्मा के पास पहुंचेगा और ईश्वर ने किये कर्मों का हिसाब मांगा तो वह क्या जवाब देगा? और 
फरीदा बेइिनवाजा कुतिया ऐह न भली रीति।।
कबही चली न आया पंजे बखत मसीति।।
प्रो. किशन सिंह ने शेख फरीद को पंजाबी सूफी काव्य का एक शिरोमणी कवि माना है। फरीद जी का काव्य सिर्फ पेचीदा ही नहीं बल्कि उनकी अपनी जिन्दगी का गुजरा हुआ अनुभव और यर्थाथवादी काव्य है।
फरीदा मैं जाणिया दुखु मुझ के दुखु सबाईये जगि।।
उच्चे चढ़ के देखिया ता घरि धरि ऐहा अग।
प्रोफेसर खलीक अहमद निजामी भी फरीद जी की वाणी की रूपक विशेषता का विश्लेषण करता हुआ लिखता है कि आदि गं्रथ में आपके जितने श्लोक मिलते हैं, उनकी विचारधारा, बिंब और शब्दावली फरीद जी की प्रतिभा के अनुकूल हैं।
फरीदा जिन लोईण जगु मोहिया से लोइण मैं डिठ।
कजल रेख न सहदिया से पंखी सूई बहिठु।।
अर्थः फरीद जी फरमाते हैं कि जिन खूबसूरत आंखों ने दुनिया को मस्त कर रखा था, उनकी सारी हकीकत मैंने जान ली है। वह नाजुक आंखे, जो कभी भी काजल की धार नहीं सह सकती थी। आज व्यक्ति की मौत के बाद आंखों के उन खानों में पंछियों ने अपने बच्चे दे रखे हैं। जवानी और हुस्न का क्या मान?
फरीद जी ने अपने अनुभव को बड़े ग्रहण योग्य, प्रमाणिक और प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया है। चिन्तन से पता लगता है कि फरीद ने उस समय के सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और संास्कृतिक ढांचे पर कटाक्ष भी किया है। समाज में प्रचलित कुरीतियों का चित्रण शेख फरीद की विशेषता रही है। हज़रत किरमानी ने अपनी पुस्तक सीअरूल औलीया में फरीद काव्य को सीरी वर्ता-अस्त कह कर इसकी शैलीगत विलक्षणता की तरफ एक बड़ा भरपूर संकेत किया है।
फरीद जी ने वाणी में सहनशीलता नम्रता, लालच त्याग, एकता, दया, प्रेम, सहानुभूति, मेल-मिलाप और सहज-भाव जैसे गुणों को धारण करने के लिए कहा है।
बिरहा बिरहा आखिये बिरहा तू सुल्तान।।
फरीदा जित तन बिरहु न उपजे सो तनु जाण मसान।।
अर्थः फरीद जी कहते हैं कि लोग बिछुड़ना-बिछुड़ना कहते तो रहते हैं, इसकी बुराई भी करते हैं, परन्तु यह बिछोड़ा (अलगाव) ही मनुष्य जीवन का सुल्तान है। जिस दिल में विछोड़े के भाव ही पैदा नहीं होते, वह दिल तो शमशान भूमि के समान है और वहाँ कोई जज़बात भी अंकुरित नहीं हो सकता।
चाहे समय कोई भी हो, फरीद वाणी हमारा नैतिक जीवन स्तर ऊँचा करने के लिए आज भी उतनी ही जरूरी है जितनी कि उस समय सार्थक था। फरीद वाणी का गुणगान करते हुये प्रो. ब्रहम जगदीश सिंह लिखते हैं कि फरीद का कलाम मनुष्य को मनुष्य के साथ जोड़ने के लिए एक पुल का काम करता है।
प्यारा सिंह पद्धम के अनुसार फरीद वाणी का मूलाधार महात्मा बुद्ध का शुद्ध शिष्टाचार, बाबा गोरख का तप और त्याग, हज़रत मोहम्मद साहिब का धैर्य, संतोष और भवित पद्धति की प्रेम प्रधान भक्ति है।
बेशक फरीद जी आज हमारे बीच जिस्मानी रूप में मौजूद नहीं है। पर जब तक फरीद जी की वाणी जिन्दा है, वह रूहानी तौर पर हमेशा हमारे दरमियान रहेंगे। फरीद जी की वाणी आर्दश समाज के निर्माण के लिए अत्यन्त जरूरी है।
जिस तरह बारहवीं तेरहवीं सदी (शताब्दी) में सूफीवाद प्रणाली के प्रचलन और आलौकिक सूफी वाणी के प्रचार के अनुसार लोग मज़हबी फासलों को मिटाकर एक दूसरे के निकट होते गये। इसी तरह आज भी हम अपने आस-पास मजहब, नसल, जाति-पाति, बोली और आर्थिकता की जो दीवारें उभारें हुए बैठे हैं। उनको तोड़ कर आधुनिक समाज की असंतुलित स्थिति को संतुलित करने के लिए और मज़हबी-बहिशत के खात्मे, सितम ज़रीफी, भाषयी और क्षेत्रीय झगड़े खत्म करने के लिए फरीद वाणी का प्रचार अति आवश्यक है। सो जरूरत है फरीद वाणी के प्रचार अति-आवश्यक है। सो जरूरत है फरीद वाणी के योग्य प्रचार का, वाणी को समझने की और जीवन में ढालने की। तब ही हम आदर्श जीवन का निर्माण कर सकने में कामयाब हो सकेंगे।

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