शूरवीर मिर्जा
प्यार को मनुष्य की चौदह मूल प्रवृतियों में से उत्तम माना जाता है। दुनियां की बाकी भाषाओं की तरह पंजाबी जुबान में भी प्रेम कहानी को एक विशेष स्थान प्राप्त है। वैसे तो हर प्राणी की कोई न कोई अपनी प्रेम कहानी होती है लेकिन वह स्वंय (निज) तक ही सीमित होकर रह जाती है। परन्तु कुछ मनुष्यों की प्रेम कहानी आम लोगों से अलग, दिलचस्प अलौकिक और अलग होती है। इसलिए लोग उनकी कहानी सुनाते हैं और वह साहित्य का अनूठा अंग बनकर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक होती हुई सदियों तक अमर रहती हैं। ऐसी ही एक प्रेम कहानी है, मिजऱ्ा-साहिबा। जब भी मिजऱ्े का जि़क्र होता है तो हमारे दिल में चार पात्र साक्षात आ खड़े होते हैं। एक किस्से का नायक मिजऱ्ा, दूसरी नायिका साहिबा और तीसरा सहायक पात्र मिजऱ्े की घोड़ी बक्की और चौथा वह (बूक्ष) जिसकी छाय में मिजऱ्ा मारा जाता है। किस्सा शब्द जिसका अर्थ कहानी, कथा या वृतांत होता है। चाहे यह अरबी भाषा का शब्द है, लेकिन पंजाबी में भी इसको उतनी ही मान्यता प्राप्त है, जितनी कि अरबी, फारसी या इरानी अदब में है। किसी का उद्भव विद्वानों अनुसार फारसी मनस्वी परम्परा द्वारा हुआ है। हमारे पास जिऊणा मोड़, दुल्ला भट्टी, जैमल-फत्ता, सुच्चा सूरमा, शाहणी कौल, रूप-बसन्त जैसे किस्से और पंजाबी किस्सेकारों के नामों की लम्बी सूची मौजूद है। जिनमें से दामोदर (हीर-रांझा), वारिश शाह (हीर-रांझा), हाशम कादरयार (सस्सी-पुन्नू), पीलू (मिजऱ्ा-साहिबा), हाफिज़ बरखुरदार (मिजऱ्ा-साहिबा), अहमद यार (कामरूप-कामलता), कादर यार (राजा रसालू, पूर्ण भगत), फज़ल शाह (सोहणी-महिवाल, लैला-मजनू), इमाम बख्श (शाह बहिराम), अहमद गुजर, मुकबल आदि नाम प्रमुख है।